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सोमवार, 21 सितंबर 2009

बासर


                                          बासर स्थित माँ सरस्वती जी का मंदिर


     बासर : जहाँ विराजमान हैं


    विद्या की देवी माँ सरस्वती


         शरदिंदु  समाकारे परब्रहम स्वरूपिणी
         वासरा पीठनिलये, सरस्वती नमोस्तुते

आन्ध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले के मुधोल विधान सभा  क्षेत्र का एक छोटा सा गाँव बसर, जिसकी आबादी लगभग पॉँच हजार के आस-पास होगी.बसर गाँव से लगकर बहतीं है दक्षिण की गंगा कही जाने वाली नदी गोदावरी. गोदावरी के तट पर ही स्थित है विद्या के देवी माँ सरस्वती जी का विशाल मंदिर.सरस्वती जी के इस मंदिर के विषय में कहते है कि यह मंदिर दुनिया में अकेला मंदिर है.माँ  के दो ही मंदिर दुनिया में हैं एक यह,दूसरा जम्मू कश्मीर के लेह में.इस मंदिर के विषय में कहते है कि महाभारत के रचयिता महाऋषि वेद व्यास जब मानसिक उलझनों से ग्रस्त हो गए वे शांति के लिए तीर्थों कि यात्रा पर निकल पड़े ,अपने मुनि वृन्दों सहित उत्तर भारत कि तीर्थ यात्राए कर दंड्यकारण (बासर का प्राचीन नाम) पहुंचें .उन्होंने गोदावरी नदी के तट के सोंदर्य कों देख कर कुछ समय के लिए यहीं पर रुक गए.किवदंतियों के मुताबिक महाऋषि वेद व्यास गोदावरी के उत्तर दिशा स्थित कुमारांचल पर्वत श्रेणियों कों जो र्रंग-बिरंगें फूलों से भरी पड़ी थी ,पर मंत्र मुग्ध हो गए .वहां पर गोदावरी में स्नान कर भक्ति भावः से माँ शारदा  व  सरस्वती कि आराधना करते  हुए कहा कि "हे परम दयामय सच्चिनमयी बागेश्वरी आप कों मेरा प्रणाम .सारे स्थल ,जंगल व सृष्टि कि पालन पोषण करने वाली माँ देवी आप ही हैं. हे अन्नंतगुणरूपिणी,स्वप्रकाशरूपिणी ,परब्रम्ह्मयी जननी ,जिस निराकार तत्त्व कों जानने के लिए वैदिक ऋषि "कस्मैदेवाय हविषा विधेम"भी चकित होते हैं, वही निरंकार तत्व रूपी भगवती तुम ही हो.कहा जाता हा कि इस तरह कि प्रार्थना पर माँ ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि "हे वत्स तुम हर दिन गौतमी (जिसे अज गोदावरी नदी के नाम से जाना जाता हे.)नदी में स्नान करो ओउर उसके बाद तीन मुठ्ठी भर रेत तीन जगहों पर विधि विधान के साथ स्थापित करो, जिसमे मैं सत्व,रजो व तमगुणों से भरी श्री ज्ञान  सरसवती ,श्री महाकाली एवम श्री महालक्ष्मी के रूप  मैं अवस्थित हो जाउंगी ,ये तीनो रूप मेरे ही होंगे.

मंदिर के उत्तर दिशा मैं पहाडी पर  एक गुफा हे , जिसे नरहरी मालुका गुफा के नाम से जाना जाता हे .यहाँ पर नाथ पंथ के घुंडीसूत नरहरी मालुका तप किया करते थे. वे यहीं पर रहे ,यहीं पर उनकी समाधि भी है .माँ सरस्वती मंदिर से हट कर अन्य तीर्थ व मंदिर भी है,जिनमें दत्त मंदिर ,गणेश मंदिर ,एकवीर मंदिर ,पातालेश्वर मंदिर व हनुमान मंदिर मुख्य है. इसके अलावा मंदिर के पूरब मैं पापहरणी नामक एक झील है , जिसकी आठ दिशाओं में तीर्थ है .इस लिए इस झील कों अस्टतीर्थ झील भी कहा जाता है. यहाँ के तीर्थों में इन्द्र तीर्थ,सूर्य तीर्थ,व्यास तीर्थ वाल्मीकि तीर्थ,विष्णु तीर्थ,सरस्वती तीर्थ प्रसिद्ध हैं.                                                 सरस्वती तीर्थ के बारे में कहा जाता है कि यह तीर्थ झीलों के बीच में है ,जहाँ पर गोदावरी का जल अंतरविहीन मार्ग से अत है.इसी लिए कहते हैं कि आठ दिशाओं में आठ पुण्य तीर्थ हैं.
गुफाएं ,कहते हैं कि माँ सरस्वती के आलय से थोडी दूर स्थित दत्त मंदिर से सरस्वती मंदिर तक पाप हरेश्वर मंदिर से होते हुवे गोदावरी नदी तक कभी एक सुरंग हुआ करती थी, जिसके द्वारा उस समय के महाराज पूजा के लिए आया-जाया करते थे. कि किवदंती के अनुसार बासर क्षेत्र बियावान जंगल हुआ करता था जहाँ पर शेर चीता, हिरन ,भालू  अदि जानवर स्वतंत्र विचरण किया करते थे.जिनके भय से पुजारियों इस मार्ग का चयन किया था. बताते हैं कि आज से पचास साल पहले तक बासर क्षेत्र में चीते अदि जानवर घुमा करते थे.
मुख्य पूजा:अक्षराभ्यास (विधयारम्भ ), कुमकुमार्चना ,कोटि पूजा, सत्यनारायण पूजा ,अन्न्प्रासंना आदि .मनोकामना पूरी होने के लिए भक्त नारियल के साथ-साथ साडी  आदि चडाते हैं.इसके आलावा मुख्य मंदिर के पार्श्व में अपनी मनोकामना पूरी होने के लिए भक्त सिक्के लगते हैं,यदि वह सिक्का दिवार से चिपक गया लगाने वाले कि मनोकामना पूरी हो जाती है.कहते हैं कि माँ के मंदिर में रात कों विश्राम करने पर माँ का आशीर्वाद मिलता है .जिसके चलते हर दिन सैकडों भक्त मंदिर के परिसर में चाहे जाडा हो या बरसात या फिर गर्मी ,हर मौसम में स्टे दिखाई देंगे .यहाँ इस बात का भी प्रचलन है कि ऐसा करने पर भक्तों कि मनकामना भी पूरी होती है.उल्लेखनीय है कि मंदिर का मुख्या द्वार शाम कि पूजा के बाद बंद कर दिया जाता है,लेकिन मंदिर परिसर का द्वार हरदम खुला रहता है. केवल ग्रहण के दिनों को छोड़ कर.मंदिर का रख - रखाव श्री ज्ञान  सरस्वती देवस्थानम संस्था द्वार किया जाता है. जिसका सीधा नियत्रण आंध्र प्रदेश सरकार के अधिन होता है. मंदिर के रख-रखाव का सारा जिम्मा मंदिर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पास होता है,जो अवकाश प्राप्त आई. ऐ .एस. अधिकारी या फिर उसके स्तर का होता है.मंदी में हर माह भक्तो द्वारा लाखों का चडाव आता है.
बासर कैसे पहुंचें :
रेल मार्ग :
बासर सिकंदराबाद -मुंबई रेलवे लाइन(नांदेड,औरंगाबाद व मनमाड ) पर स्थित है जहाँ पर हर  सवारी  एवम एक्सप्रेस गाडियां रुकती हैं. सिकंदराबाद -बासर के बीच लगभग 190  किलोमीटर कि दूरी है.निजामाबाद से बासर कि दूरी कुल चालीस किलो मीटर है. निजामाबाद में मुंबई,विशाखापतनम ,तिरुपति ,संबलपुर (उडीसा),रामेश्वरम (तमिलनाडु), ओखा (गुजरात) अकोला,नांदेड,औरंगाबाद ,शिर्डी ,मनमाड से आने वाली सभी गाडियां रुकती हैं. इसके अलावा देश के किसी भी जगह  से चल कर मनमाड,सिकंदराबाद,आदिलाबाद ,से होते हुवे बासर पंहुचा जा सकता है.



सड़क मार्ग :
बासर सिकन्दराबाद -नांदेड मार्ग पर स्थित है,जिसकी दूरी लगभग 210 किलो मीटर के आस -पास है. बासर के लिए हैदराबाद  से राज्य परिवहन निगम कि बसें चलती हैं. इसके अलावा आंध्र प्रदेश पर्यटन विभाग भी पैकेज में यात्रा करवाती है.बासर के लिए निजामाबाद से हर आधे घंटे पर बस सेवा उपलब्ध है. वहीँ आदिलाबाद ,नांदेड,शिर्डी , मंचीरियल आदि जगहों से बस सेवायें उपलब्ध हैं.
हवाई मार्ग :
निकतम हवाई अड्डा नांदेड (130 कि मी ),नागपुर (325 कि.मी.)औरंगाबाद(425 कि.मी.)एवं सिकंदराबाद (300 कि.मी.).वहां से सड़क मार्ग से बासर पहुंचा जा सकता है.
कहाँ रुकें:
बासर में रुकने के लिए काफी संख्या में लाज ,होटल एवं गेस्ट हॉउस के साथ -साथ तिरुपति देवस्थानम ,वेमुल्वाडा देवस्थानम द्वार बनवाये गए  विश्राम गृह भी हैं. जहाँ पर आप आराम से रुक सकते हैं.


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शनिवार, 19 सितंबर 2009

सैर कर दुनिया की गाफिल ......

                                           
                                    सैर कर दुनिया की गाफिल ....

पत्रकारिता के  साथ-साथ, घूमना-फिरना भी मेरा एक शौक रहा है.जिसका एक कारण यह भी है की काम के सिलसिले में जैसे समाचार संकलन करने के अलावा संसदीय वा विधान सभा के चुनावों कों भी कवर करना ,उस दौरान जो भी समय मिलता उसका उपयोग उस जगह के स्थानों कों देखने के कर लेता हूँ. कुछ घूमना तो नौकरी खोजने  के लिए हुआ तो कुछ नौकरी के दौरान. लेकिन आज भी घूमना जरी है. जब भी मौका मिलता है घुमाने निकल जाता हूँ.देश के बाहर नहीं जा पाया ,विदेश के नाम पर केवल नेपाल कि यात्रा ही की है.वह भी काठमांडू के निकट पाल्पा (वहां का तानसेन जिला) एवम बहराइच से लगे नेपाल गंज की.जहाँ तक में समझताहूँ कि भारत में क्या नहीं है देखने लायक .हर चीज तो है अपने इस देश में.आसम से लेकर तमिलनाडु तक कि यात्रा कि है .चार-पॉँच राज्य ही हैं जिन्हें अभी नहीं देख पाया हूँ. लोग दुबई जाते ,थाईलेंड ,मलेशिया ,आस्ट्रलिया आदि जाते हैं. में कहता हूँ कि वहां से अच्छा है कि आप अंदमान निकोबार कि यात्रा करें ,एक बार अगर आप वहां गए तो फिर दूसरी बार कहीं ओंर नहीं जायेंगे.पिछले ३० वर्षों से घूम रहा हूँ.पहली बार यात्रा कब की ठीक से याद नहीं ,हाँ सन १९७२ में पिताजी के साथ पहली बार सपरिवार फैजाबाद से मेरठ गया  था ,क्यों कि पिता जी उन दिनों वहीँ पर राजस्व विभाग में थे .तब उनके साथ हम लोगों नेमेरठ के साथ -साथ हरिद्वार ,देहरादून एवं मसूरी देखा .बस तभी से घुमने  का जो चसका लग वह आज भी जारी है .उन दिनों रेलगाडियों में रिजर्वेशन जैसी सुविध नहीं थी.प्रथम वा द्वितीय श्रेणी के टिकट होते थे .हम लोगों ने  द्वितीय श्रेणी मैं यात्रा की थी.ख़ैर उसके  बाद १९७६ में वाराणसी पढ़ने चला गया ,फिर अकेले यात्रा जो शुरू  हुई तो आज बदस्तूर जारी है.अब यात्रा में मेरi पत्नी कुसुम के अलावा मेरी दोनों बेटियाँ सृष्टि एवं दृष्टि भी साथ होती हैं.
पहली बार में ने वाराणसी से दिल्ली की यात्रा की. यह बात है सन १९८६ की ,तब मे दिल्ली स्थित भारतीय जन संचार संसथान
के एक पंद्रह दिवसीय सेमिनार में भाग लेने गया ,पहली बार अकेले बाहर निकला था,वहीँ पर काफी मित्र बने,जिनमे मुंबई के सांसद
संजय  निरुपम ,अजय श्रीवास्तव ,जाहिर कुरैशी ,नूतन भारती,रजनी नागपाल ,सुरेन्द्र कुमार सिन्हा बीनू आदि.आज ये सभी लोग पत्रकारिता के व्यवसाय में,( केवल संजय निरुपम जी कों छोड़ कर,वे अब पत्रकारित छोड़ कर रजनीति में अपनी एक अलग पहचान बना ली है) अपनी मुकाम बना चुके हैं..इन्ही लोगो के संगत में आने के बाद जो दिल्ली आने- जाने का सिलसिला चला तो चलता रहा.इस व्यवसाय में आने के बाद तो देश के कई हिस्सों का दौरा किया .
उन दिनों राहुल स्सक्र्त्यांन जी का एक लेख भी पढ़ा था जिसका शीर्षक था घुमंतो अथ जिज्ञासा ,जिसकी दो पंक्तियाँ हैं ...
सैर कर दुनिया की गाफिल ,जिंदगानी फिर कहाँ |
जिंदगानी गर रही  तो, नव जवानी फिर कहाँ.
इस ब्लाग के माध्यम से में आप सब कों देश के कुछ अच्छे जगहों के बारे में जानकारी देने का प्रयास हिंदी में करूँगा.क्यों कि पर्यटन पर अंग्रेजी में काफी सामग्री उपलब्ध है,लेकिन हिंदी में न के बराबर.कुछ पत्र-पत्रिकाएं इस पर जानकर देतीं जरुर हैं पर वह भी व्यवसायिक तौर पर.
आप अपने विचारों से अवगत जरुर करते रहियेगा.जिससे मुझे लिखने कि प्रेणना मिलती  रहे.
जय पर्यटन
प्रदीप श्रीवास्तव
नवरात्रि, 19 सितम्बर 2009