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रविवार, 12 सितंबर 2010

कोणार्क का सूर्य मंदिर

        कोणार्क का
   "सूर्य मंदिर"  
   पाषाण पर उकेरा 
      एक काव्य
   


कटक ,भुवनेश्वर एवम जगनाथ पूरी की यात्रा करें ओंर कोणार्क का सूर्य मंदिर न देखें तो यह  कोई बात नहीं हुई. कटक का किला देखने के बाद हम लोगों ने कोणार्क जाने का प्लान बनाया.उड़ीसा पर्यटन विभाग से संपर्क किया तो पता चला कि हर सुबह पर्यटन परिसर से कोणार्क एवम जगन्नाथ पूरी के लिये वातानुकूलित एवम गैर वातानुकूलित बसें पर्यटन विभाग चलता है.जो सुबह वहाँ से नौ बजे चलती हैं.हम लोगों ने एक दिन पहले ही टिकट बुक करवा लिया .मेरे साथ मेरी पत्नी ,दोनों बेटियां सृष्टि एवम दृष्टि तथा मेरे मित्र मुकेश सोनी ,उनकी पत्नी , दोनों बेटियाँ नंदिनीएवम गौरी  तथा बेटा ...और मुकेश के दो दोस्तों का परिवार .कुल मिला कर लगभग पंद्रह लोंगों का समूह.दूसरे दिन हम लोग पर्यटन विभाग की बस से कोणार्क के लिये रवाना होते हैं .बस में हमलोगों के अलावा तीन परिवार और है. लगभग आधे घंटे के चलने के बाद हमारे साथ चल रहे गाइड ने बताया कि हम पिपली पहुँचने वाले हैं जो उड़ीसा कि हस्त सिल्प कला के लिये प्रसिद्ध है.सभी ने वहाँ पर खरीददारी की.वहाँ से चल कर कोई पैतालीस मिनट चलने के बाद हम लोग विश्व प्रसिद्ध सूर्य मंदिर के पास पहुंचे.जिसका निर्माण सूर्य के काल्पनिक रथ के रूप में किया गया है.
बस से उतर कर हम सब अपने समूहों में सूर्य मंदिर देखने निकल पड़ते हैं. पुरात्तव विभाग के कार्यालय से टिकट लेने के बाद मंदिर परिसर में प्रवेश करतें हैं,सामने विश्व विख्यात सूर्य मंदिर,जो  गंग वंश के शासकों के कला प्रेम एवम कलानिष्ठा की गौरव गाथा कों आज भी बयाँ कर रहा है. कभी बचपन में गुरु रविन्द्र नाथ टेगौर जी की लिखी वे पंक्तियाँ (जिसे उन्हों ने सूर्य मंदिर के बारे में लिखा था) "यह पत्थरों की भाषा है ,जिसने मनुष्यों की भाषा कों भी शिकस्त दे दी है".याद आने लगी है. यह वही सूर्य मंदिर है जिसे ब्लेक पेगोडा भी कहा जाता है.अगर हम कहें  कि "यह मंदिर स्थापत्य कला का एक बेजोड़ अल्बम है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी .मंदिर प्रांगण में प्रवेश करते ही सामने हाथी क़ी पीठ पर सवार सिंहों कि आकृतियाँ अंकित हैं.सीडियां चढ़ने के बाद एक ही पत्थर कों तराश कर बना विशाल सूर्य मंदिर काल्पनिक रथ के रूप में दिखाई देता है.जिसके चौबीस अलंकृत पहिये भारतीय महीनों के चौबीस पखवाड़ों कों प्रदर्शित करतें हैं.हर चक्के का व्यास 2 .94 मीटर का है.जिनमें बनी आठ-आठ तीलियाँ दिन के आठों पहरों क़ी ओर संकेत करती हैं.सामने की ओर बने रथ कों खींचते सात घोड़े ,सप्ताह के सात दिनों की ओर इंगित करते हैं.कहतें हैं कि इस सुन्दर कलाकृति कों बनाने में बारह वर्ष लगे थे,जिसे बारह हजार कारीगरों ने बना कर तैयार किया था.कहते हैं कि तत्कालीन उत्कल राज्य के इन बारह वर्षों की सारी आया इसके निर्माण में ही खर्च हो गई.मंदिर परिसर में बने इतने विशालकाय पत्थरों कों तराश कर बने अवशेषों कों देख कर आश्चर्य होता है कि समुद्री किनारा  होने के कारण आस-पास कोई पर्वत तो है नहीं.चोकोर परकोटे से घिरे इस मंदिर के तीन ओर ऊँचे-ऊँचे गेट बने हैं .
 मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर है,जिसके ठीक सामने समुद्र ,जहाँ से उगते सूर्य कों देखते ही बनता है.बताते हैं कि अलसुबह जब पूर्व में समुद्र के बीच से सूर्य भगवान उदय होते हैं तो उस वक्त समुद्र का नीला पानी भी लाल हो जाता है,जिसे देखते ही बनता है.ख़ैर सम्पूर्ण मंदिर तीन भागों में विभाजित है.सामने का भाग "नृत्य मंदिर",बीच वाला "जगमोहन" जिसे आराधना मंदिर एवम उसके बाद वाले कों "गर्भगृह "के नाम से जाना जाता है.समय के काल के थपेड़ों ने नृत्य मंदिर तथा गर्भगृह कों खंडहर में तब्दील कर दिया है.लेकिन जगमोहन अभी भी ठीक हालत में है.यहाँ यह बताता चलूँ कि प्रवेश द्वार पर बने हाथी कि पीठ सवार सिंह दिन के तीनों पहर कों बताते हैं.स्थानीय निवासी पटनायक बताते हैं कि "हम रोज ही देखते हैं कि सुबह कोमल सूर्य निकालता है,दोपहर में उसका तेज प्रचंड हो उठता है, और शाम का सूर्य हमें सुहावन दिखाई देता है,यही यह शिल्प हमें बताती है.सूर्य मंदिर कि दीवारों पर बने कला कि बारीकियां देखते ही बनती हैं.जिन पर अंकित हैं पशु-पक्षियों,देवी-देवताओं,मनुष्यों -अप्सराओं,लताओं कि अनुपम पिचकारियों कों देख कर पर्यटक अपलक उन्हें निहारता ही रहता है.
 दीवारों पर बनी नर-नारी की युगल काम-मुद्राएँ देख कर लगता है कि मानों वात्स्यायन (काम-सूत्र के रचयिता) ने काम-सूत्र को ही दीवारों पर उकेर दिया गया हो.मंदिर कि दीवारों पर उकेरी काम-क्रियाओं के चित्रों को देख कर पर्यटक घंटों अपलक उन्हें निहारता ही रह जाता है.खास कर नव-दंपत्ति जोड़े.हमें पहले ही बताया गया था कि उन शिल्पों को काम-भावना कि दृष्टि से नहीं बल्कि के लालित्य के दृष्टिकोण से देखे तो उसका असली आनंद मिलेगा,हुआ भी वही. दीवारों पर बड़े-बड़े पत्थरों   को तराश कर उसमें काव्य भर दिया गया है.जिसे ओडिसी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना कह सकतें हैं कोणार्क के सूर्य मंदिर यूनेस्को एवम वर्ल्ड हेरिटेज द्वारा संरक्षण भी प्राप्त है कोर्णाक के सूर्य मंदिर के निर्माण के बारे में "आईने-अकबरी" में लिखा है कि सूर्य मंदिर 9 वीं सदी में केशरी वंश के किसी रजा ने बनवाया था.जिसे बाद में गंगवंशीय रजा नरसिंह देव (प्रथम) ने (1238 -64 )अपने अधिपत्य में कर इसका जीर्णोधार कराकर देश को प्रकृति का एक अनुपम उपहार दिया.
कब जाएँ: किसी भी मौसम में जाया जा सकता है.लेकिन सितम्बर से मार्च के बीच सही समय होता है वहाँ जाने का.
कैसे जाएँ: निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर जो देश के सभी बड़े शहरों से हवाई मार्ग से सीधा जुडा है.सड़क व रेल मार्ग के लिये भुवनेश्वर व पुरी से भी जाया जा सकता है.जहाँ से पर्यटन विभाग के अलावा निजी बस,टैक्सी भी मिलती हैं.
कहाँ रुकें: भुवनेश्वर ,कोणार्क एवम पुरी में हर स्तर के होटलों के अलावा गेस्ट हाउस,धर्मशाला भी हैं.
                                                                                                                 -प्रदीप श्रीवास्तव 
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रविवार, 29 अगस्त 2010

कटक

                                                         बाराबाटी किले के खँडहर
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ प्राचीनतम  व आधुनिकता  
     का उदाहरण है          
कटक
"कटक" उड़ीसा की प्राचीन राजधानी,जिसका इतिहास हजार वर्षों  से भी पुराना बताया जाता है.जो वर्तमान राजधानी "भुवनेश्वर "से लगभग 35 किलोमीटर दूर हावड़ा रेल मार्ग पर स्थित है. कटक में आप कों पुरानी एवम नई संस्कृति कों देखने का भी  मौका आज मिल जायेगा.जनवरी माह का अंतिम सप्ताह ,कटक के थियेटर मूवमेंट द्वारा आयोजित पंद्रह दिवसीय नाट्य एवम नृत्य समारोह के आमंत्रण पर में सिकंदराबाद से विशाखा एक्सप्रेस से परिवार सहित भुनेश्वर पहुंचे ,अठारह घंटे की सफ़र ने थका दिया था.कटक रेलवे स्टेसन के पास के एक होटल में हम लोंगों ने डेरा डाला.विश्राम करने के बाद कार्क्रम में भाग लिया.दूसरे दिन सुबह उठ कर कटक घुमने का प्रोग्राम बना,सबसे पहले पहुंचे बाराबाटी  स्टेडियम (जिसे अब नेताजी सुभाष चन्द्र स्टेडियम के नाम से जाना जाता है).उस दिन वहाँ पर 26 जनवरी के समारोह की तैयारी चल रही थी.पॉँच एकड़ क्षेत्र में फैले इस विशाल अंतर राष्ट्रिय  स्टेडियम में तीस हजार लोग एक साथ बैठ कर क्रिकेट का मजा उठाते हैं.इसी स्टेडियम से सटे "बारबाटी" किले कों देखने हमलोग  पहुंचे.महानदीएवम कथ्जुरी नदी के मुहाने पर बसा कटक शहर कभी व्यापार,अर्थनीति एवम हस्तशिल्प कला का केंद्र हुआ करता था.कहते हैं कि करीब नौ शताबदियों तक कटक उड़ीसा कि राजधानी हुआ करती थी,लेकिन अंग्रेजों ने जब उड़ीसा पर अपना आधिपत्य किया तो वे कुछ दिनों के बाद भुवनेश्वर कों वहाँ कि राजधानी बना दी
.हालाँकि आज भी कटक उड़ीसा की व्यवसायिक राजधानी के रूप मे जानी जाती है.कटक के इतिहास पर नजर डालें तो केशरी राजवंश के समय बे सैनिक शिविर "कटक" जिसका शाब्दिक अर्थ होता है' किला',जिसमे उनके सैनिक  रहा करते थे के कारण ही इस शहर का नाम "कटक"पड़ा.बताते हैं की 11 वीं सदी में केशरी राजवंश ने महा नदी पर एक विशाल बांध बनवाया ,जिस पर 14 वीं शताब्दी में "बाराबाटी" किले का निर्माण हुआ.बताते हैं कि महानदी के किनारे बना यह किला नौ मंजिला हुआ करता था,जिसके खूबसूरती से तराशे गए दरवाजें लोंगों के आकर्षण का केंद्र हुआ करते थे.18 वीं सदी में मराठों ने कटक पर अपना राज्य स्थापित कर लिया,इस दौरान उन्हों ने  कटक में कई आकर्षक मंदिरों का भी निर्माण भी करवाया.लेकिन बंगाल कि खड़ी में उठने वाले चक्रवात (तूफान) के थपेड़े यहाँ अक्कसर तबाही मचाते थे.जिसके चलते वे अमूल्य धरोहर काल के गाल में समां गए."बाराबाटी" किले के बारे में बताते हैं कि 12 वीं शताब्दी के पूर्व गंग राज्य के समय बनवाया गया था,जिस पर सन 1560 -1568 के बीच रजा मुकुंद देव ने किले के परिसर में अतरिक्त निर्माण करवा कर विशाल किले का रूप दिया.1568 से 1603 तक यह किला अफगानियों,मुगलों एवम मराठा राजाओं के अधीन था.सन 1803 में अंग्रेजों ने इस किले कों मराठों से छीन लिया.बाद में वे भुवनेश्वर चले गए ओउर यह किला उपेक्षित पड़ा रहा.जिसके खँडहर आज इस बात कि गवाही देते हैं कि कभी यह ईमारत बुलंद रही होगी.इसी शहर में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने जन्म लिया ,जिनका घर आज स्मारक के रूप में पर्यटकों के लिये खुला रहता है.  कहतें हैं कि सिखों के पहले गुरु गुरुनानक देवजी जगन्नाथपुरी जाते समय कुछ समय के लिये यहाँ पर रुके थे. उन्होंने जो दातून कर के वहाँ फेंकी थी ,उससे वहाँ पर एक पेड़ लग गया था ,ज आज भी है.उसी जगह गुरुद्वारा बनवाया गया था जिसे आज "गुरुद्वारा दातून साहेब "के नाम से जाना जाता है.इस गुरूद्वारे कों" कालियाबोड़ागुरुद्वारा के नाम से भी पुकारते हैं.

कटक की कुल आबादी 5 .35 लाख है,जिसमे स्त्री व पुरुष का अनुपात 48 :52 तथा साक्षरता 77 प्रतिशत है.कटक कों यदि मंदिरों का शहर कहा  जाय तो कों अतिश्योक्ति नहीं होगी.जिनमे मुख्य मंदिर हैं परमहंस नाथ मंदिर, चंडी मंदिर,भट्टारिका मंदिर धबालेश्वर मंदिर,पॉँचमुखी हनुमान मंदिर आदि. इसके अलावा अन्य दर्शनीय स्थलों में प्रमुख हैं कदम-ऐ -रसूल ,जुमन मस्जिद ,साली पुर का संग्राहलय एवम नदी के किनारे बनी पत्थर की दीवार.इसके अलावा जब आप कटक जाएँ तो वहाँ पर स्थित चावल अनुसन्धान संसथान कों देखना न भूलें,यह एशिया का एकमात्र केंद्रहै.
                                       नेताजी सुभाष चाँद स्टेडियम
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अगर आप कटक जाने का कार्यक्रम बना रहें हैं तो पैकेज के लिये मैथली ट्रावेल्स
से इस नम्बर 09848472190 पर श्री अर्जुन सेठिया से संपर्क करें  .
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बुधवार, 24 मार्च 2010

     रास आईलेंड :जहाँ आज भी गूंजती है 
           स्वतंत्रता सेनानियों  की आवाजें 
अंदमान निकोबार कि राजधानी पोर्ट ब्लेयर के पूर्व दिशा में स्थित एबदीन जट्टी से लगभग आठ सो मीटर कि समुद्री कि दूरी पर एक छोटा सा द्वीप है,जिसे रास  आईलेंड  के नाम से जाना जाता है .जिसका कुल क्षेत्रफल है 0 .6 वर्ग किलोमीटर अर्थात ०.१३ मील.जिसका अधिकांश  भाग जंगलों से घिरा हुआ है. जब पर्यटक १५ से २० मिनट कि समुद्री यात्रा कर के इस द्वीप पर पहुचाते हैं तो उन्हें लगता है कि यहाँ पर जीवन है ही नहीं.क्योंकि वहाँ पर इंसानों के रहने का कोई संकेत ही नहीं मिलता है.अंदमान सरकार ने इस द्वीप पर किसी के भी न रहने का निर्देश दिया है.यही कारण है कि सूरज ढलने के पहले ही द्वीप कि खाली करवा लिया जाता है.कहते हैं कि इस द्वीप कि भव्यता के चलते कुछ दशक  पहले तक इसे " पूरब का पेरिस " कहा  जाता था
 .कालांतर में यह द्वीप (रास  आईलेंड )ब्रिटिश हुकूमत का एक हिस्सा हुआ करता था.जहाँ से अंग्रेज अधिकारी सेल्युलर  जेल (काला पानी) में सजा कट रहे स्वतंत्रता सेनानियों पर अपनी पेनी निगाह रखते थे.इतिहास के पन्नो कों पलटें तो इस बात का पता चलता है कि रास आईलेंड भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों कों दंड देने का मुख्य कारावास भी था.जब आप रास आईलेंड पर पानी के जहाज से उतरेंगे तो सबसे पहले जापानियों द्वारा बनाया गया बनकर दिखाई देगा,उससे थोडा आगे बढ़ने पर ब्रिटिश सेना के अधिकारियों का मनोरंजन क्लब ,उससे थोडा आगे बड़ने पर सैन्य अधिकारियों एवम उनकी गोरी मेमो के स्नान करने के लिए तरन ताल (स्विमिंग पुल)दिखाई देगा.वहाँ से थोडा आगे बदने पर आपको पानी शुद्धिकरण प्लांट ,उसके आगे जनरेटर प्लांट के अवशेष दिखाई देंगे.वहीँ से आप दाहिने कि ओर मुड़ जाएँ  तो सामने आप कों ऊपर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में गिरजा घर के अवशेष दिखाई देंगे ,जो इतिहास कि गवाही देते हैं.गिरजा घर के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो चुकें है .उसके बगल में आप कों एक पुराना भवन दिखाई देगा,जिसे अंगरेजों का सचिवालय बताते है.सचिवालय के बगल में ही टेनिस कोर्ट ,छपाईखाना ,अस्पताल आदि कि टूटी फूटी इमारतें अपने अतीत कि गवाही देती मिलेंगी.गिरजाघर के ठीक पीछे अंगरेजों कि कब्रगाह है,जिन पर लगे शिलापट्टो से पता चलता है कि कब -कब कोन से अधिकारी वहा दफनाये गए थे.गिरजा घर के पास ही उनके लिए मनोरंजन घर बना हुआ है,जिसे नाच घर के नाम से जाना जाता है, जिसकी छत तो अब नहीं है लेकिन सीमेंट कि बेंच आज भी  अपने अस्तित्व कि गवाही देती हैं.इस आइलैंड पर अंग्रेज अधिकारियों के आवासों के अलावा बाजार-हाट भी हुआ करते थे.जिसके अवशेष आज भी विधमान हैं.
कहते हैं कि सन 1788 -89 आर्कबाल्ड नामक एक अंग्रेज अधिकारी अंदमान-निकोबार द्वीप समूह का दौरा करने के बाद पोर्ट ब्लेयर के उत्तरी दिशा में स्थित दिगलीपुर से पूर्व में कार्नवालिस पोर्ट कों आवासीय स्थल के रूप में विकसित किया.उसने इस द्वीप पर अस्पताल एवम कब्रगाह बनवाई,लेकिन सन 1796 में आद्रता कि मात्र इस द्वीप  पर बढ जाने के करण आम लोगों के  द्वीप  आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया. लगभग छह दशक के बाद सन 1857 में जब ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ आन्दोलनकारियों ने बिगुल बजाया,तब उन आन्दोलनकारियों क कला पानी की सजा के लिए पोर्ट ब्लेयर भेजा गया.उस समय यह छोटासा द्वीप ही था,उसी दौरान अंग्रेज सरकार ने रास आई लेंड को नवम्बर 1857 में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए कारावास के रूप में उपयोग करना शुरू कर दिया था.उन दिनोंवहाँ पर दो तरह के कैदियों कों रखा जाता था .एक वे कैदी होते थे जो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा रहे थे तथा दूसरे वे जो बगावत के सन्दर्भ में मुखबिरी करते थे.बताते हैं कि दो माह बाद ही अंग्रेजों ने 1858 में पोर्ट बेलेयर के आस-पास के तीन अन्य द्वीपों पर भी अपना अधिपत्य कर लिया.उन्ही दिनों वहाँ पर एक अंग्रेज इंजिनियर के.एच .मन ने " यूनियन जैक " का झंडा फहराया .बाद में सेल्युलर जेल के अधिक्षक जे .पी.वाकर ने अपने 14 यूरोपियन अधिकारियों ,एक भारतीय निगरानी करता ,दो डाक्टर 50 नाविकों एवं कुछ सुरक्षा कर्मियों के साथ लगभग 773 स्वतंत्रता सेनानियों कों लेकर पोर्ट बेलेयर पहुंचे,उन दिनों पोर बेलेयर में पानी कि काफी किल्लत थी,जिसके चलते उसे पोर बेलेयर छोड़ कर रास आईलेंड में शरण  लेनी पड़ी.उल्लेखनीय है कि जलपोत पर्वेक्षक सर ड़ोनियल रास ने ही इस द्वीप पर पहल जेल बनवाया था.उन्ही के नाम पर इस द्वीप का नाम रास आईलैंड पड़ा.सर ड़ोनियलरास ने सबसे पहले स्वतंत्रता सेनानियों कों घास -फूँस कि झोपड़ियों में रखा. बाद में उन स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने अथक परिश्रम से द्वीप पर माकन,कार्यालय व बेरेक आदि बनाये.उन स्वतंत्रता सेनानियों के कार्य दक्षता कों देखते हुए अंगरेजों ने उन्हें वाइपर द्वीप पर स्थान्तरित कर दिया .बताते हैं कि आगे चल कर रास आईलेंड पर दंडाधिकारियों के लिए भवन आदि बनवाये गए, जिसके अवशेष आज भी विधमान हैं.पूरा का पूरा बाज़ार ,घर आदि के खँडहर इस बात कि गवाही देते हैं कि कभी यहाँ कि इमारतें बुलंद थी, जिन पर पेड -पोधे  उग आये हैं.
सन 1872 में अंग्रेज हुकूमत ने अपने प्रशासनिक विभाग में फेर बदल करते हुए अधीक्षक पद कों पदोन्नति देते हुए उसे मुख्य आयुक्त का ओहदा दे दिया . जिस पर सबसे पहले सर डोनाल्ड मार्टिन स्टीवर्ट नामक एक अंग्रेज अधिकारी बैठा .बताते हैं कि सर स्टीवर्ट एक साल तक रास आईलेंड पर ही रहे.उनके बाद 24 मुख्य आयुक्तों ने रास आईलेंड पर रह कर काम किया लेकिन चार्ल्स फ्रांसिस वाटरफाल के कार्यकाल के दौरान ही रास आइलें से अंग्रेजों कि हुकूमत खत्म होने लगी.कयोंकि सन 1938 में जब उन्हें मुख्य आयुक्त नियुक्त किया गया तो इसी बीच मार्च 1942 में जापानियों ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अंदमान और निकोबार पर कब्ज़ा कर लिया.कब्ज़ा होते ही जापानी अधिकारियों ने सबसे पहले सर वाटर फाल कों अपनी हिरासत में लिया,इसी बीच उनके निकट सहयोगी उपायुक्त मेजर बर्ड कों जापानी सेना ने पोर्ट  ब्लेयर के मुख्य बाज़ार एबरदीन क्लाक टावर के पास गिरफतार कर बंदी बना लिया.मार्च 1942  से अक्तूबर 1945  तक रास आईलेंड जापानी एडमिरल का सरकारी आवास बना रहा .इसी दौरान भारत कि स्वतंत्रता  कों लेकर नेताजी सुभास चन्द्र  बोस ने जापानियों की थी इसलिए सन 1943 की दिसंबर माह में नेताजी ने रास आईलेंड के सरकारी आवास पर भारतीय तिरंगा फहराया था.दूसरे उध के बाद एक बार फिर से रास आईलेंड अन्गेरेजी हुकूमत के अधीन आ गया,लेकिन इस बार अंग्रेज अधिकारियों ने इस द्वीप की ओर मुड़कर नहीं देखा.विश्व युद्ध खत्म हने के 9  माह बाद भूकंप के कई झटके इस द्वीप ने सहे.द्वीप जापानियों के कब्जे में था,उनहोने ने भी इसे छोड़देना मुनासिब समझा.फिर यहीं से शुरु हो गई  रास आईलेंड के पतन की कहानी. समय के थपेड़ों ने "पूरब का पेरिस "कहे जाने वाले इस द्वीप कों अपने आगोश में लेना शुरु कर दिया.आज भी इस द्वीप पर अंगरेजों की क्रूरता के निशान ,बंदी भर्ती स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा बनाये गए भवनों के अवशेष इतिहाश की गवाही देते हैं.आप कों इस द्वीप पर बन्दर, हिरण के अलावा अन्य कोई जानवर नहीं दिखाई देंगे.हाँ वहाँ पर आप कों चिड़ियों की चह-चाहट जरुर सुनाई देगी.बंगाल की खड़ी के बीच बसे इस द्वीप पर आप कों कौवे भी दिख जायेंगे .
सन 1979 के अप्रेल माह मे भारतीय नौ सेना ने रास आईलेंड कों अपने कब्जे में ले लिया.दिसंबर 1993 में भारत सरकार एवम अंदमान प्रशासन ने इस आईलेंड पर एक छोटे से संग्रहालय "स्मृतिका" की स्थापना की. जसमे अंग्रेजों के क्रूरता के साथ-साथ ब्रिटिश हुकूमत द्वारा अंग्रेजी में लिखे गए पत्रों की मूल प्रतियाँ संजोकर रखी हुई  है.अब इस द्वीप पर सूरज ढलने के बाद किसी कों भी रुकने की इजाजत नहीं है,यहाँ तक की नौ सेना के जवानों कों भी नहीं.  शाम चार बजे इस द्वीप से अंतिम बोट (छोटी जहाज) पोर्ट बेलेयर के लिए वापस लौटता है जिसमे पर्यटकों के साथ-साथ ड्यूटी पर तैनात सेना के जवान भी वापस लौट जाते हैं.इसके पीछे बताते हैं कि आज भी अँधेरा होते ही इस द्वीप पर शहीद स्वतंत्रता सेनानियों एवम  क्रूर अंग्रेजों क़ी भयानक आवाजें गूंजती हैं. कहते तो यहाँ तक हैं कि आधी रात के बाद किसी के नाचने कि आवाजें भी आती हैं .दिन में भी द्वीप पर सन्नाटा छाया रहता है . बात जो भी हो अगर आप अंदमान जाएँ तो " रास आईलेंड" पर जरुर जाएँ .जहाँ पर आप कों भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के साथ गोरों द्वारा किये गए अत्याचारों कि दास्तान आप कों स्वयं  महसूस कराएगी.
दूरी        :    1200 किलोमीटर हवाई दूरी.
कैसे पहुंचे:    पोर्ट ब्लेयर  से रास आईलेंड (द्वीप) के लिए अंदमान प्रसाशन द्वार छोटे जहाज चलाये जाते हैं.
                  पोर्ट ब्लेयर के लिए चेन्नई व कोलकत्ता से सीधी हवाई सेवा उपलब्ध है.दो घंटे का सफ़र है.
                  विशाखापत्तनम ,चेन्नई एवम कोलकत्ता से पानी के जहाज चलते हैं.जो कम -से-कम 56 घंटे लेता है.           
                                                                                                   प्रदीप श्रीवास्तव 
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गुरुवार, 4 मार्च 2010

       चारमीनार :नील गगन की
       छांव में लिखी एक कविता
नवाबों का शहर हैदराबाद ,हैदराबाद में तहजीब और इसके मिजाज की एक यादगार धरोहर "चारमीनार "पिछले चार सौ साल से एक खामोश सिपाही की तरह खडा शहर की हिफाजत करता आ रहा है. लेकिन हम आज तक अपनी इस विरासत की हिफाजत नहीं कर पाए ,बरसों की उपेछा और प्रदुषण के बेसुमार मार झेलकर यही चारमीनार अब अपनी चमक और शान-ओ-शोकत खोती जा रही है.वास्तुशिल्प की इस अदभुत 55 मीटर ऊँची गगनचुम्बी अभिनव रचना का निर्माण 1591 में मुहमद कुली कुतुब शाह ने कराया था.जिसकी वास्तु शिल्प को देख कर कहा जा सकता है कि "नील गगन  कि छावं में लिखी एक कविता कि मानिंद हैं,जिसकी मीनारें छंद हैं.जिनसे इस काव्य कि रचना पूरी होती है.इस धरोहर रूपी काव्य के रचयिता शहंशाह कुली कुतुब शाह स्वयं एक अजीम शायर थे, कहते हैं है कि जब उनकी यह काव्य प्रस्तर पर  उकेरी जा चुकी तो उन्हों ने सबसे पहला काम किया कि इसके नक्शे को ही नष्ट  कर दिया.जिससे कोई और दूसरे शहर में इसकी प्रतिकृति न बना सके.कहते हैं कि   मुहमद कुली क़ुतुब शाह का दिल मूसा नदी के उस पार के एक गाँव कि रहने वाली एक युवती पार आ गया ,जिसका नाम भागमती था ,
 भागमती बेहद सुन्दर हिन्दू कन्या थी,साधारण परिवार कि रहने वाली भागमती में सोंदर्य के साथ नृत्य  एवं गायन की कला भी कूट-कूट कर भरी थी.जिसके प्रेम पाश में कुली क़ुतुब शाह इस कदर बंध गया था कि उसे मूसा नदी के उसपर भागमती से मिलने जाने में कठिनाई होती,यह बात उसके पिता तक पहुंची,जिसपर पिता ने अपनी मानमर्यादा कि परवाह न करते हुवे दुनिया के सामने प्रेम कि एक मिशाल पेश करते हुवे मूसा नदी पार पुल ही बनवा दिया. जब सन1580 में कुली क़ुतुब शाह ने सत्ता सँभालते ही भाग मति से विवाह कर लिया.इसी के बाद उसके मन में गोलकोंडा से अलग हट कर एक नया शहर  बसाने का विचार आया. उस नए शहर का नाम अपनी पत्नी भागमती के नाम पार भाग्य नगर रखा इतिहास के पन्ने बताते हैं कि जब 1596 में शहर बनकर तैयार हो गया तो बादशाह ने मरे खुशी के अपनी पत्नी भागमती का नाम हैदर महल कर दिया. कहते हैं कि उसी के बाद इस शहर का नाम हैदराबाद  हो गया जो आज तक चला आ रहा है.
 इसी  हैदराबाद शहर में शान के साथ आज भी खड़ा चार मीनार ताजमह कि तरह प्रेम मुहब्बत कि बयां करता है. चार मीनार कि रचना के पीछे भी एक कहानी बताई जाती है.कहतें हैं कि सन 1598 में हैदराबाद में प्लेग कि महामारी फैल गई .जब शहर महामारी से निजात पाया तो उस ख़ुशी में इस चार मीनारों  वाली ईमारत  "चारमीनार" का निर्माण कराया गया.बहुत ही काम लोगों को पता है कि इसे "विजय महल "के नाम से भी जाना जाता है.55 मीटर ऊँचे इस भवन के चारों तरफ  चार मीनारें हैं ,जिसमें 146  सीडियां हैं.इसके आलावा इस भवन में विभिन्न आकर के 140 बुर्ज हैं.इसे देखने हर रोज हजारों देशी-विदेशी पर्यटक हैदराबाद आते हैं.
कैसे  पहुंचे :हैदराबाद (सिकंदराबाद)देश के सभी प्रमुख शहरों से हवाई, रेल एवम सड़क मार्ग से जुडा हुआ है.
कहाँ रुकें :हर तरह के होटल व लाज हैं.                                                                                                        कुसुम श्रीवास्तव

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

निज़ामाबाद का नील कंठेश्वर मंदिर

जहाँ पूरी होती है मनोकामना

लगभग चार लाख की आबादी वाले निज़ामाबाद शहर में स्थित है नील कंठेश्वर यानि भगवन शिव जी का विशाल मंदिर. बताते हैं की यह मंदिर लगभग १४ सो पुराना है. जो जैन एवम आर्यों की शिल्प कला कों अपने में समेटे हुए है. कहतें हैं की शातवाहनकल के दुतीय रजा पुल्केशी द्वारा जेन धरम स्वीकार लिए जाने के कारण इस मंदिर कों जेन मंदिर के रूप में विकसित किया गया.वहीँ पुराणो में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है,. कहते हैं की काकतिया वंश के राजाओ ने बाद में इस मंदिर कों शिवालय के रूप में स्थापित किया.किवदंती है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग भगवन विष्णु कि से प्रकट हुआ था. इस लिए इसे नील कंठेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है.लगभग तीन एकर के विशाल क्षेत्र में बने मंदिर के परिसर में कुंड के अलावा हनुमानजी ,माँ पार्वती,गणेश भगवान ,विट्ठल भगवान के मंदिरों के साथ ही पंचवटी अर्थात पीपल,नीम ,बढ,गुलेर एवम जंबी के विशाल पेड हैं.कहावत है कि इन पाँचों पेड़ों कों संतान वृक्ष के रूप में मना जाता है.किवदंती है कि निः:संतान दंपत्ति यदि इन पेड़ो कि परिक्रमा कर ले तो उसकी मनोकामना पूरी होती है.संतान के साथ-साथ उसे धन व यश भी मिलता है.महाशिवरात्रि के अवसर लाखों भक्त बाबा भोले नाथ के दर्शन के पुन्य प्राप्त करते हैं.

कैसे पहुंचे:

निज़ामाबाद सिकंदराबाद-नांदेड मार्ग पर स्थित है. जो रेल सड़क मार्ग से जुडा हुआ है.निकतम हवाई अड्डा हैदराबाद (२०० किलो मीटर )एवम नांदेड (१३० किलो मीटर )है.

सिकंदराबाद ,नादेड ,आदिलाबाद से सरकारी बस सेवाएं भी उपलब्ध हैं.

कहाँ रुकें :निज़ामाबाद में सरकारी विश्राम गृह,के अलावा होटल भी हैं .

क्या देखें:

निज़ामसागर, अशोक सागर,कोलस किला. दिचपल्ली का रामालय के अलावा ४० किलो मीटर दूर में सरस्वती जी का विशाल मंदिर,जो बासर में स्थित है
 
प्रदीप श्रीवास्तव


महा शिवरात्रि ,१२ फरवरी ,२०१०