चित्र पर किलिक करें

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011


  प्रकृति क़ी गोद में बसा है  
 " कतरनिया घाट वन जीव अभ्यारण  "

प्रदीप श्रीवास्तव  
 जंगलों के बीच किसे घूमना पसंद नहीं होगा,फिर प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेते हुए उसमे विचरण करना तो सोने पर सुहागा वाली बात होती है | लेकिन वहीँ वन्य प्राणियों के बीच घूमने का साहस काम ही लोगों में होता है |जबकि हर व्यक्ति क़ी इतनी चाह तो जरुर ही होती है कि वह वन्य प्राणियों को उनकी स्वाभाविक आचरण में जरुर देखे |जहाँ पर वह शेर-चीते को शिकार करते हुए, हिरण-सांभर को घने हरे जंगलों के बीच कुलांचे मारते हुए देख सके |हर वन प्रेमी पर्यटकों में  यह आस होती है कि वह जंगल के बीच से बहती नदियों में मछलियों को तैरते हुए,घड़ियाल एवम मगर को रेतीले नदी के तट पर विश्राम करते हुए देख सके | इन्हीं सपनों को सजों कर मै ने हाल में ही उत्तर प्रदेश के बहराइच एवम पीलीभीत तथा नेपाल क़ी सीमा से लगे "कतरनिया घाट वन्य जीव अभ्यारण्य " क्षेत्र के भ्रमण करने  का मन बनाया |बचपन से ही कतरनिया घाट के बारे में सुनते आया था,लेकिन पास में होने के बावजूद अभी  तक वहाँ नहीं जा सका  | नवम्बर माह के तीसरे सपताह में में अपने रिश्तेदार आशीष एवम उनके दो मित्रों के साथ बहराइच से कतरनिया के लिये  निकले |रास्ते में बहराइच जिले क़ी नानपारा तहसील पड़ती है ,तहसील क़ी सीमा ख़त्म होते ही कतरनिया घाट वन अभ्यारण्य क्षेत्र शुरु हो जाता है, लगभग पॉँच सौ किलोमीटर वर्ग क्षेत्र में फैले इस जंगल के बीच से  आज भी छोटी लाइन क़ी रेल दौड़ती है  |यह रेल मार्ग गोंडा को पीलीभीत से वाया बहराइच जोड़ती है | घने जंगलों के बीच इस रेल खंड पर लगभग अस्सी किलोमीटर क़ी यह  रेल यात्रा अपने आप में रोमांचित पैदा करने वाली होती है | कतरनिया घाट वन जीव अभ्यारण नेपाल से निकलने वाली कौडियाल एवम गेरुआ नदी के संगम पर स्थित है | ये दोनों नदियाँ थोडा आगे जा कर शारदा नदी में जा कर मिल जाती हैं ,जो वहाँ से थोडा आगे जा कर घाघरा एवम सरयू के नाम से जानी जाती है |इसी सरयू नदी पर भगवान राम क़ी नगरी अयोध्या बसी है |कौडियाल एवम गेरुआ नदी के उस पर लगभग बारह किलोमीटर के बाद नेपाल देश क़ी सीमा शुरू हो जाती है |हल्की धुप,घने हरे जंगलों के बीच ऊँचे -ऊँचे पेड़ों के बीच से जब हमारी कार गुजर रही थी तो हमने रास्ते में देखा क़ी हर दस मीटर के बाद दोनों ओर दीमक के बिम्ब (घर)बने हुए है , जिनकी ऊँचाई दो मीटर से लेकर आठ मीटर रक् रही होगी |जिसके बारे में अशिस बताते हैं कि पेड़ों के काटने के बाद उनके जड़ों में दीमक इसी तरह अपना बसेरा बना लेते है,कहते हैं क़ी जहाँ पर दीमकों के बिम्ब होते हैं वहाँ पर सांप भी पाए जाते हैं ,लेकिन हम लोगों को रास्ते भर में एक सांप नहीं दिखाई दिया | हाँ घने जंगलों के बीच ऐसा लग रहा था कि मानों शाम हो गई हो,जबकि उस समय दोपहर के बारह ही बज रहे होंगे | उस पर जंगली जानवरों व पक्षियों क़ी अजीबो-गरीब आवाजे सन्नाटे को चीरती हैं तो एक अलग तरह का रोमांच पैदा होता है | अगर कहा जाय कि कतरनिया घाट वन जीव अभ्यारण क्षेत्र लुप्तप्राय वनस्पतियों एवम जीवों का सबसे शांत निवास है ,जो उन्हें आश्रय भी देता है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा | इस वन क्षेत्र में बाघ,तेंदुए ,घड़ियाल, मगरमच्छ ,गैंडा,हाथी जंगली सूअर ,चीतल,हिरण के अलावा बड़ी डालफिन मछली ,,कई प्रजातियों के बन्दर,अजगरों के अलावा यहाँ पर एक-से-एक सुनदर व विभिन्न तरह के पक्षियों को कभी देखा जा सकता है |आज दुनिया में गिद्धों क़ी संख्या में निरंतर गिरावट देखी जा रही है,लेकिन यहाँ पर जंगलों के बीच विभिन्न प्रजातियों के गिद्धों को देखा जा सकता है |जिनमे खाकी रंग वाला ,लाल सिर वाला एवम मिस्र में पाए जाने वाले गिद्ध प्रमुख हैं |
दिन भर क़ी यात्रा के दौरान मुझे कतरनिया के जंगलों में बाघ ,चिट्टा व शेरों के दर्शन तो नहीं हुए ,परन्तु एक जगह बाघ के पैरों के चिन्ह जरुर दिखाई दिया,जो एक नाले के किनारे था| जिसके बारे में हमारे साथ चल रहे विनोद बताते हैं कि शायद कुछ देर पहले ही कोई बाघ यहाँ पानी पीने आया था |यह सुन कर एक बार मेरे शरीर में सिहरन सी दौड़ पड़ी |सोच कहीं आस-पास तो नहीं है ? ख़ैर वहाँ से आगे बड़े तो थोड़ी दूर जाने पर देखा कि नदी क़ी ओर जाने वाला मार्ग लकड़ी क़ी बल्ली से बंद है,अभी हम लोग सोच ही रहे थे कि उधर से गुजर रही दो नेपाली महिलाओं ने बताया कि उस लकड़ी के बल्ली को हटा कर जा सकते हैं |हम लोगों ने वैसा ही किया,और गेरुवा नदी के किनारे पहुँच गए | सामने कौडियाल एवम गेरुआ नदी का  संगम, पास में ही मिनी पुरवा गावं ,नदी के संगम पर बने तट पर दर्जनों घडियाल सुनहरी रेत पर पावं पसारे आराम फरमा रहे हैं,जिनमे तो कुछ नवजात भी थे| जिन्हें देख कर लगा कि चलो यहाँ तक आना  सफल रहा |  अ़ब इच्छा हुई क़ी उन्हें पास से देखा जाये ,लेकिन उनतक पहुँचाना कठिन था,तभी मिनी पुरवा गावं के किसान बशीरुद्दीन मिल जाते हैं ,पहले वे हम लोगों को देख कर चोंक जाते हैं ,उन्हें लगता है कि जंगल विभाग का कोई अधिकारी है,लेकिन उनकी परेशानी हम लोग भांप जाते है और उन्हें आश्वस्त करते है कि जो वह समझ रहे हैं, हम लोग वह नहीं हैं | तब बशीरुद्दीन बताते हैं कि आप को घड़ियाल को निकट से देखना है तो कतरनिया घाट पर ही जाये,वहाँ से मोटर बोट मिल जायेगी ,जिससे आप लोग वहाँ तक जा सकेंगे| हम लोग वहाँ से कतरनिया घाट के चल देते हैं ,ठीक जंगल के बीच टेड़े- मेडे रास्तों पर,जिसके दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड ,उनके बीच लम्बे-लम्बे जंगली घास|
इसी दौरान जंगल के बीच सुनसान ईलाके में तीन युवतियां अपने-अपने सर पर लकड़ियों क़ी गाठें लड़े आती हुई दिखाई देती है,तभी उनमे से एक काम उम्र क़ी लड़की हम लोगों को देख कर लकड़ी क़ी गांठ वहीँ छोड़ कर भाग जाती है,जब कि उसके साथ वाली दोनों लड़कियां डरी-सहमी सी एकटक हमलोगों को देखती रहती हैं ,जिन्हें हम लोग बताते हैं कि हम सरकारी आदमी नहीं है,इस पर वे निश्चिन्त होती हैं|तभी वह युवती भी वापस आ जाती है,जिसके चहरे पर से डर का भाव गायब दिखाई देता है | वे हमें आगे का रास्ता बतातीं है,जिस पर हम चल देते हैं | थोड़ी दूर आगे जाने पर जैसे ही हमारी कार दाहिने ओर मुड़ती है तो सामने एक बारहसिंगा बीच रास्ते में दिखाई देता है | जिसे देख कर हम अपनी गाड़ी वहीँ रोक देते है,इसी बीच मैं अपना कैमरा आन करना चाहता हूँ कि उसे अपने कैमरे में कैद कर  सकूँ,तभी वह कुलांचे मारता हुआ हमें ठेंगा दिखा कर गायब हो गया| | यहाँ यह बता दूँ कि कतरनिया के इस घने जंगल में सेल फ़ोन काम नहीं करता है,क्यों कि किसी भी कम्पनी के टावर नहीं लगे हैं |सरकारी महकमा वायरलेस पर या फिर बी एस. एन.एल पर ही निर्भर रहता है | अब हम लोग उस जगह पर पहुंचाते हैं जहाँ से वन विभाग द्वारा मोटर बोट से नदी के बीच बने रेतीले टापू  पर आराम कर रहे घड़ियालों  को दिखाया जाता है| लेकिन दोपहर होने क़ी वजह से वहाँ पर कोई भी कर्मचारी नहीं मिल सका जो हमें वहाँ तक ले जाता | पास में ही काफी ऊँचा मचान बना है जहाँ से चढ़ कर लोग रेतीले टापू पर बैठे घडियालों को देख सकते हैं |
इसी कौडियाल एवम गेरुआ नदी में डालफिन मछली भी बहुतायत मात्रा में पाई जाती है | कहते हैं कि डालफिन मछली अमेरिका के बाद भारत में यहीं पर अधिकाधिक संख्या में मिलाती है| वैसे गंगा नदी के दोआबा में (बिहार )में भी मिलाती हैं| इस संदर्भ में क्षेत्रीय वन अधिकारी एन.के शुक्ला  बताते हैं कि यहाँ पर वही पर्यटक अधिक आते हैं जिन्हें प्रकृति से प्रेम होता है |उनमे भी अधिक संख्या विदेशियों की अधिक होती है |जो यहाँ पर आ कर हफ्तों नहीं महीनों रुकते हैं और  शोध कार्य भी करते हैं | श्री शुक्ला  जी बताते हैं कि  कौडियाल एवम गेरुआ नदी के साफ और नीले पानी में घडियालों के अलावा वहाँ पर आप को प्रवासी पक्षियों का भी सुन्दर  नजारा देखने को भी मिलेगा |पानी की सतह पर रंग-बिरंगी विदेशी पक्षियों को देख कर आम आदमी भी मंत्रमुग्ध हो जाता है |वे बताते हैं कि सूर्यास्त के साथ ही कौडियाल एवम गेरुआ नदी के सतह पर डालफिन मच्चालियों की हठखेलियाँ शुरु हो जाती हैं | पहले इस पार से उस पार जाने के लिये पीपे का पुल हुआ करता था,जिस पर से शाम को लोग डालफिन मछलियों के नृत्य का आनंद उठाते थे ,लेकिन कुछ साल पहले उसके टूट जाने से लोगों को वह आनंद नहीं मिल पा रहा है | यहाँ पर डब्ल्यू .डब्ल्यू.एफ. के सौजन्य से खास पर्यटकों के लिये कुछ विशेष सुविधाएँ भी मुहैया कराई जाती हैं ,जिनमे मोटर बोट भी शामिल हैं |जिस पर आप सवार होकर घडियालों व मगरमच्छ के टापुओं तक पहुंचाते हैं ,साथ ही वहाँ पर सुरखाब के दर्शन भी कर सकते हैं |मोटर बोट से आप जंगल के भीतर गेरुआ के बैक वाटर के काफी अन्दर तक भी जा सकते हैं | जब आप बेतों के जंगलों के बीच पानी से गुजरें गे तो आप अंदमान निकोबार क़ी याद अवश्य आएगी| पानी के दोनों किनारे बेतों क़ी घनी झाड़ियाँ ,जिनके स्पर्श होने पर काँटों का चुभना आप को और रोमांचित कर देता है |इन्हीं झाड़ियों के बीच अक्सर शाम को जंगल के राजा बाघ पानी पीते  दिखाई देते हैं , वहीँ हाथियों के जुंड को भी देखा जा सकता है यहाँ पर | सही मायने में कहा जाये तो यह जगह अजगरों के लिये उनका बसेरा ही है | कतरनिया घाट के जंगलों में हजारों प्रजातियों के पक्षियों को पाकड़ , पीपल,बड़,गुलर शीशम ,साल व सागवान के  पेड़ों पर फुदुकते देखा जा सकता है| जिनमें नीलकंठ,बुलबुल,पत्थरचिट्टा ,टनटूर,कोकिल ,हुदहुद,चील, मोर, तीतर,कठफोड़वा,बटेर ,टिटहरी ,बाज,तोता,गिद्ध,कबूतर बयान ,श्यामा के साथ-साथ जंगली मुर्गे शामिल हैं| जंगली मुर्गे रंगबिरंगे होते हैं जिन्हें देखते ही बनता है |
कतरनिया घाट वाइल्ड लाईफ सेंचुरी (कतरनिया वन्य जीव अभ्यारण्य )सन 1997 में अस्तित्व में आया जब सरकार ने इसकी विधिवत घोषणा की |इसके पहले तक इसे सामान्य जंगलों क़ी श्रेणी में ही रखा जाता था | बताते हैं क़ी 1980 के पहले यहाँ पर अंग्रेजों के निर्देशानुसार पेड काटो जीवन चलाओ का फार्मूला लागू था | लेकिन 1980 में जब तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी स्वीडेन गईं तो उन्हों ने वहाँ पर देखा क़ी वहाँ के लोग जंगल बचाने में लगे हैं | इससे वे बहुत प्रभावित हुईं | स्वदेश लौटने के बड़ उनहोने देश के जंगलों को बचाने के लिये 1980 कन्जर्वेसन एक्ट बनाया, जिसे तुरन्त  लागू किया गया,तभी से "पेड काटो -बेचो " क़ी जगह "जंगलों को बचाओ "लागू हो गया | इस एक्ट के लागू होने से पेड़ों के काटने पर रोक लग गई |
यहाँ यह बताना समायोचित होगा कि पहले एवम दूसरे विश्व युद्ध में प्रयोग किये गए पानी के जहाजों में जिन लकड़ियों का प्रयोग किया गया था ,वे सभी कतरनिया के जंगलों के ही थे | वन विभाग के एक सरकारी अधिकारी ने नाम न बताने क़ी शर्त पर बताया कि रेलवे में सीमेंट के स्लीपरों के पहले पूरे भारत में लकड़ी के जो स्लीपर प्रयोग में लाये जाते थे वे सभी कतरनिया के जंगलों के ही होते थे |
प्राकृतिक सम्पदा से भर पूर कतरनिया वां जीव अभ्यारण्य क्षेत्र में पर्यटकों के लिये रुकने क़ी कोई समुचित व्यवस्था नहीं है ,जिसके कारण पर्यटक यहाँ आना पसंद नहीं करते है |कुल मिलाकरइस अभ्यारण्य क्षेत्र में वन विभाग के दो गेस्ट हाउस हैं जिनकी बुकिंग वन विभाग के बहराइच के कार्यालय से नहीं तो राजधानी लखनऊ के मुख्यालय से करानी होती है | घने जंगलों के बीच होने क़ी वजह से भी पर्यटक रात में रुकना नहीं चाहते हैं |
जबकि कतरनिया घाट क़ी दूरी लखनऊ से लगभग दो सौ पचास किलोमीटर एवम बहराइच से सत्तर एवम पीलीभीत से साठ किलोमीटर है|



        

रविवार, 11 दिसंबर 2011

राजधानी दिल्ली:हवाई जहाज से प्रदीप श्रीवास्तव द्वारा लिया गया चित्र 
---------------------------------------------------------------------------------------------
 दिल्ली हुई सौ बरस की
किसी भी भारतीय को यह जानकर हैरानी होगी कि आज की नई दिल्ली किसी परंपरा के अनुसार अथवा स्वतंत्र भारत के राजनीतिक नेताओं की वजह से नहीं, बल्कि एक सौ साल (1911) पहले आयोजित तीसरे दिल्ली दरबार में ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज पंचम की घोषणा के कारण देश की राजधानी बनी. इस दिल्ली दरबार की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना ब्रिटिश भारत की राजधानी के कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरण की घोषणा थी. 12 दिसंबर, 1911 में ब्रिटेन के राजा की घोषणा से पहले इस ऐतिहासिक तथ्य से अधिक लोग वाक़ि़फ नहीं थे. किंग जॉर्ज पंचम के राज्यारोहण का उत्सव मनाने और उन्हें भारत का सम्राट स्वीकारने के लिए दिल्ली में आयोजित दरबार में ब्रिटिश भारत के शासक, भारतीय राजकुमार, सामंत, सैनिक और अभिजात्य वर्ग के लोग बड़ी संख्या में एकत्र हुए थे. दरबार के अंतिम चरण में एक अचरज भरी घोषणा की गई. तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हॉर्डिंग ने राजा के राज्यारोहण के अवसर पर प्रदत्त उपाधियों और भेंटों की घोषणा के बाद एक दस्तावेज़ सौंपा. अंग्रेज राजा ने वक्तव्य पढ़ते हुए राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने, पूर्व और पश्चिम बंगाल को दोबारा एक करने सहित अन्य प्रशासनिक परिवर्तनों की घोषणा की. दिल्ली वालों के लिए यह एक हैरतअंगेज फैसला था, जबकि इस घोषणा ने एक ही झटके में एक सूबे के शहर को एक साम्राज्य की राजधानी में बदल दिया, जबकि 1772 से ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता थी.
 एक तरह से नई दिल्ली का अर्थ भारतीय उपमहाद्वीप के लिए एक साम्राज्यवादी राजधानी और एक सदी के लिए अंग्रेज हुक्मरानों के सपनों का साकार होना था, हालांकि इसके पूरा होने में 20 साल का व़क्त लगा. यह भी तब, जबकि राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने के साथ ही नई दिल्ली बनाने का फैसला लिया गया. इस तरह नई राजधानी केवल 16 साल के लिए अपनी भूमिका निभा सकी. नई दिल्ली में निर्माण कार्य 1931 में पूरा हुआ, जब सरकार इस नए शहर में स्थानांतरित हो गई. 13 फरवरी, 1931 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने नई दिल्ली का औपचारिक उद्घाटन किया.
लॉर्ड हॉर्डिंग लिखते हैं कि इस घोषणा से उपस्थित लोगों में आश्चर्यजनक रूप से गहरा मौन पसर गया और चंद सेकंड बाद करतल ध्वनि गूंज उठी. ऐसा होना स्वाभाविक था. अपने समृद्ध प्राचीन इतिहास के बावजूद जिस समय दिल्ली को राजधानी बनने का मौक़ा दिया गया, उस समय वह किसी भी लिहाज़ से एक प्रांतीय शहर से ज़्यादा नहीं थी. लॉर्ड कर्जन के बंगाल विभाजन की घोषणा (1903) के बाद से ही इसका विरोध कर रहे और एकीकरण की मांग को लेकर आंदोलनरत बंगालियों की तरह दिल्ली वालों ने कोई मांग नहीं रखी और न कोई आंदोलन छेड़ा. किंग जॉर्ज पंचम की घोषणा से हर कोई हैरान था, क्योंकि यह पूरी तरह गोपनीय रखी गई थी. उनकी भारत यात्रा के छह महीने पहले ही ब्रिटिश भारत की राजधानी के स्थानांतरण का निर्णय हो चुका था. इंग्लैंड और भारत में दर्जन भर व्यक्ति ही इससे वाक़ि़फ थे. राजा की घोषणा के समानांतर बांटे गए गजट और समाचार पत्रकों को भी पूरी गोपनीयता के साथ छापा गया. दिल्ली में एक प्रेस शिविर लगाया गया, जहां सचिवों, मुद्रकों और उनके नौकरों के लिए रहने की व्यवस्था की गई और वहीं प्रिटिंग मशीनें लगाई गईं. दरबार से पहले इन शिविरों में कर्मचारियों को लगा दिया गया और दरबार की वास्तविक तिथि से पहले इस स्थान की सुरक्षा को चाक चौबंद रखने के लिए सैनिकों-पुलिस की टुकड़ियां तैनात कर दी गई थीं. सात दिसंबर, 1911 को ब्रिटेन के राजा और रानी (जार्ज पंचम और क्वीन मेरी) दिल्ली पहुंचे. शाही दंपत्ति को एक जुलूस की शक्ल में शहर की गलियों से होते हुए विशेष रूप से लगाए गए शिविरों के शहर (किंग्सवे कैंप) में गाजे-बाजे के साथ पहुंचाया गया. उत्तर-पश्चिम दिल्ली में विशेष रूप से निर्मित एक सोपान मंडप में आयोजित दरबार में चार हज़ार ख़ास मेहमानों के बैठने की व्यवस्था की गई और एक वृहद अर्द्ध आकार के टीले से क़रीब 35,000 सैनिक और 70,000 दर्शक दरबार के चश्मदीद गवाह बने. दरबार के दौरान लॉर्ड हॉर्डिंग सहित काउंसिल के सदस्यों, भारतीय राजाओं, राजकुमारों सहित कइयों ने अंग्रेज राजा की कदमबोसी की और हाथ को चूमा. 25 गुणा 30 मील के घेरे में फैले क्षेत्र में 223 तंबू लगाए गए, जहां 60 मील की नई सड़कें बनाई गईं और क़रीब 30 मील लंबी रेलवे लाइन के लिए 24 स्टेशन.
अहमद अली के उपन्यास-टि्‌वलाइट इन दिल्ली (1940) के अनुसार, वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने व्यक्तिगत रूप से दरबार की तैयारियों का जायज़ा लिया. कुल 40 वर्ग किलोमीटर में फैले 16 वर्ग किलोमीटर के घेरे में पूरे भारत से क़रीब 84,000 यूरोपियों और भारतीयों को 233 शिविरों में ठहराया गया. 1911 में बसंत के मौसम के बाद क़रीब 20,000 मज़दूरों ने दिन-रात एक करके इन शिविरों को तैयार किया. इस दौरान 64 किलोमीटर की सड़कों का निर्माण हुआ, शिविरों में पानी की व्यवस्था के लिए 80 किलोमीटर की पानी की मुख्य लाइन और 48 किलोमीटर की पाइप लाइनें डाली गईं. मेहमानों के खानपान के लिए दुधारू पशुओं, सब्जी और मांस का इंतज़ाम किया गया. दिल्ली दरबार का आयोजन एक जनवरी, 1912 को होना था, पर इस दिन मुहर्रम होने की वजह इसे कुछ दिन पहले करने का फैसला किया गया.
1877 में लॉर्ड लिटन ने महारानी विक्टोरिया की कैसरे हिंद के रूप में उद्घोषणा के अवसर पर पहले दिल्ली दरबार का आयोजन किया गया था. महारानी विक्टोरिया के उत्तराधिकारी के रूप में एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के अवसर पर 1903 में लॉर्ड कर्जन के समय दूसरे दिल्ली दरबार का आयोजन किया गया. यह दरबार 29 दिसंबर से अगले साल दस दिनों तक चला था. इसके एक भाग का आयोजन लालकिले के दीवान-ए-आम में किया गया था. दूसरे दिल्ली दरबार पर खर्च हुए 1,80,000 पाउंड की तुलना में तीसरे दिल्ली दरबार पर 6,60,000 पाउंड की राशि ख़र्च हुई. किनेमाकलर ने तीसरे दिल्ली दरबार की फिल्म-विद अवर किंग एंड क्वीन थ्रू इंडिया (1912 में सबसे पहली बार प्रदर्शित) बनाई. यह फिल्म से अधिक एक मल्टी मीडिया शो थी. किंग जॉर्ज पंचम और क्वीन मेरी ने किंग्सवे कैंप में आयोजित दिल्ली दरबार में 15 दिसंबर, 1911 को नई दिल्ली शहर की नींव के पत्थर रखे. बाद में इन पत्थरों को नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के पास स्थानांतरित कर दिया गया और 31 जुलाई, 1915 को अलग-अलग कक्षों में रख दिया गया. स्थापना दिवस समारोह में लॉर्ड हार्डिंग ने कहा कि दिल्ली के इर्द-गिर्द अनेक राजधानियों का उद्घाटन हुआ है, पर किसी से भी भविष्य में अधिक स्थायित्व अथवा अधिक ख़ुशहाली की संभावना नहीं दिखती. रॉबर्ट ग्रांट इर्विंगंस की पुस्तक-इंडियन समर में हार्डिंग कहते हैं, हमें मुगल सम्राटों के उत्तराधिकारी के रूप में सत्ता के प्राचीन केंद्र में अपने नए शहर को बसाना चाहिए. वायसराय ने बतौर राजधानी दिल्ली के चयन का ख़ुलासा करते हुए कहा कि यह परिवर्तन भारत की जनता की सोच को प्रभावित करेगा. तत्कालीन भारत सरकार के गृह सदस्य सर जॉन जेनकिंस ने कहा कि यह एक साहसिक राजनयिक क़दम होगा, जिससे चहुंओर संतुष्टि के साथ भारत के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी. अंग्रेजों की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने के दो प्रमुख कारण थे. पहला, बंगाली अंग्रेजों के लिए काफी समस्याएं पैदा कर रहे थे और अंग्रेजों की नज़र में कलकत्ता राजनीतिक आतंकवाद का केंद्र बन चुका था. वहां लोग रायटर्स बिल्डिंग पर बम फेंक रहे थे, जबकि दिल्ली में ऐसे हालात नहीं थे. लॉर्ड कर्जन के शासनकाल के बाद अंग्रेज बंगालियों को उपद्रवकारी और राजनीतिक रूप से सजग मानने लगे थे. दूसरा, यह एक तरह से मुसलमानों को ख़ुश करने का भी फैसला था. अंग्रेजों की सोच यह थी कि वे एक ही समय में हिंदू और मुसलमानों को नाराज़ नहीं कर सकते. इस सिलसिले में 1911 में आयोजित दिल्ली दरबार की ऐतिहासिक घटनाओं के ब्योरे वाला अहमद अली का उपन्यास दिल्ली में आहत मुस्लिम सभ्यता की पड़ताल करता है. इस किताब के ज़रिए लेखक ने तत्कालीन भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद की कहानी बयान करते हुए उपनिवेशवादी ताक़त से टक्कर पर मुस्लिम नज़रिए को सामने रखते हुए साम्राज्यवादी साहित्य को चुनौती दी है.
नीरद सी चौधरी ने आजादी मिलने के तुरंत बाद प्रकाशित अपनी आत्मकथा-द ऑटोबायोग्राफी ऑफ अननोन इंडियन में उनकी (बंगालियों) प्रतिक्रिया का स्मरण करते हुए लिखा कि 1911 में मौत का साया, जिससे हम सब अपरिचित थे, पहले ही कलकत्ता पर पसर चुका था. मुझे अभी भी अपने पिता द्वारा उनके मित्रों के साथ राजधानी के दिल्ली स्थानांतरण का समाचार पढ़ने की बात याद है. कलकत्ता का स्टेट्‌समैन गुस्से में था, पर वह भविष्य के बजाय इतिहास के बारे में ज़्यादा सोच रहा था और वह कासनड्रा की तरह भविष्यवाणियां करने का इच्छुक नहीं था. हम बंगाली कासनड्रा की तरह भविष्यवक्ता नहीं थे. हम बातूनी थे. मेरे पिता के एक दोस्त ने रूखेपन से कहा कि वे साम्राज्यों के क़ब्रिस्तान दिल्ली में द़फन होने जा रहे हैं. इस बात पर वहां मौजूद हर कोई हंस पड़ा. हम सभी की तीव्र इच्छा का लक्ष्य अंग्रेजी साम्राज्य का द़फन होना ही था, पर उस दिन हम में से किसी ने भी नहीं सोचा था कि ऐसा होने में केवल छत्तीस साल लगेंगे. अंग्रेज सत्रह सौ सत्तावन से कलकत्ते में राज करते रहे. दिल्ली राजधानी बनाने के छत्तीस साल बाद उनके विश्वव्यापी साम्राज्य का सूरज डूब गया. 1912 में एडविन लैंडसिर लुटियन और उनके पुराने दोस्त हरबर्ट बेकर को बतौर वास्तुकार नए शहर को बसाने की ज़िम्मेदारी दी गई. लुटियन के चुनाव में उनके काम के अनुभव का कम और रिश्ते का जोर ज़्यादा था. सरकारी इमारतें और शहर के वास्तु से उनका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था. महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने लॉर्ड लिटन, जिन्होंने 1877 में महारानी विक्टोरिया के समय दिल्ली दरबार की अध्यक्षता की थी, की एकलौती बेटी एमली लिटन से शादी की थी. लुटियन का खास मित्र और सहयोगी गर्टरूड जेकल, जो अच्छा बाग वास्तुशास्त्री भी था, भी एक अच्छे संपर्कों वाला व्यक्ति था. लॉर्ड हॉर्डिंग भी मार्च 1912 के अंत में अपने लाव-लश्कर के साथ दिल्ली पहुंच गए. 1911 में दिल्ली राजधानी स्थानांतरित होने पर दिल्ली विश्वविद्यालय का पुराना वायस रीगल लॉज वायसराय का निवास बना. प्रथम विश्व युद्ध से लेकर क़रीब एक दशक तक वायसराय इस स्थान पर रहे, जब तक रायसीना पहाड़ी पर लुटियन निर्मित उनका नया आवास नहीं बना.
मौजूदा नई दिल्ली शहर दिल्ली का आठवां शहर है. नई दिल्ली के लिए अनेक स्थानों के बारे में सोचा और अस्वीकृत किया गया. दरबार क्षेत्र को अस्वास्थ्यकर और अनिच्छुक घोषित कर दिया गया, जहां बाढ़ का भी ख़तरा था. सब्जी मंडी का इलाक़ा बेहतर था, पर फैक्ट्री क्षेत्र में अधिग्रहण से मिल मालिक नाराज़ हो जाते. सिविल लाइंस में यूरोपीय आबादी को हटाने से उसकी नाराज़गी का ख़तरा था. अत: लुटियन के नेतृत्व में मौजूदा पुराने शहर शाहजहांनाबाद के दक्षिण में नई दिल्ली के निर्माण का कार्य 1913 में शुरू हुआ, जब नई दिल्ली योजना समिति का गठन किया गया. उसने पुराने शहर का तिरस्कार किया और आसपास का इलाक़ा तत्काल ही एक दूसरे दर्जे का शहर यानी पुरानी दिल्ली बन गया. लुटियन के ज़िम्मे नई दिल्ली शहर, गर्वमेंट हाउस और हरबर्ट बेकर के सचिवालय के दो हिस्सों (नॉर्थ एवं साउथ ब्लॉक) और काउंसिल हाउस (संसद भवन) को तैयार करने का भार आया. क़रीब 2,800 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली लुटियन दिल्ली का मूल स्वरूप 1911 से 1931 के मध्य में बना, जो साम्राज्यवादी भव्यता का एक खुला उदाहरण था. इसका मुख्य केंद्र ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधि वायसराय का महलनुमा परिसर (अब राष्ट्रपति भवन) था. अंग्रेज वास्तुकार नई दिल्ली को पुरानी दिल्ली की अराजकता के विपरीत क़ानून-व्यवस्था का प्रतीक बनाना चाहते थे. हरबर्ट बेकर का मानना था कि नई राजधानी अच्छी सरकार और एकता का स्थापत्यकारी स्मारक होनी चाहिए, क्योंकि भारत को इतिहास में पहली बार अंगे्रज शासन के तहत एकता मिली है. भारत में अंगे्रजी शासन केवल सरकार और संस्कृति का प्रतीक नहीं है, यह एक विकसित होती नई सभ्यता है, जिसमें पूर्व और पश्चिम के बेहतर तत्वों का समावेश है. वायसराय पैलेस का मुख्य गुंबद मुगल स्थापत्य कला की तर्ज पर बनाया गया, पर अंग्रेजों ने अपना महत्व बरक़रार रखने के लिए पैलेस की ऊंचाई शाहजहां की जामा मस्जिद से अधिक रखी.
एक तरह से नई दिल्ली का अर्थ भारतीय उपमहाद्वीप के लिए एक साम्राज्यवादी राजधानी और एक सदी के लिए अंग्रेज हुक्मरानों के सपनों का साकार होना था, हालांकि इसके पूरा होने में 20 साल का व़क्त लगा. यह भी तब, जबकि राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने के साथ ही नई दिल्ली बनाने का फैसला लिया गया. इस तरह नई राजधानी केवल 16 साल के लिए अपनी भूमिका निभा सकी. नई दिल्ली में निर्माण कार्य 1931 में पूरा हुआ, जब सरकार इस नए शहर में स्थानांतरित हो गई. 13 फरवरी, 1931 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने नई दिल्ली का औपचारिक उद्घाटन किया. प्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंह के पिता सर शोभा सिंह ने लुटियन और बेकर के साम्राज्यवादी नक्शे के अनुरूप चूना, पत्थर और संगमरमर तराशने का काम किया. खुशवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत में नई दिल्ली पर खासी रोशनी डाली है. उनके शब्दों में, मेरे पिताजी को साउथ ब्लॉक बनाने का ठेका मिला था और उनके सबसे जिगरी दोस्त बसाखा सिंह को नार्थ ब्लॉक बनाने का. हमारे मकान के सामने और दक्षिण दिल्ली से कोई बारह किलोमीटर दूर बदरपुर गांव से दिल्ली के लिए, जिसे आज कनाट सर्कस कहते हैं, छोटी रेलवे लाइन गई थी. बदरपुर से निर्माण स्थल तक पत्थर, रोड़ी और बजरी लाने के लिए यह लाइन बिछाई गई थी. जिस दिन छुट्टी होती, हम छोटी सी इंपीरियल दिल्ली रेल के आने का इंतज़ार करते कि कब वह आकर पत्थर उतारे और हम उसमें सवार होकर मुफ्त में कनाट प्लेस की सैर करके आएं.
दिल्ली दरबार रेलवे
दिल्ली दरबार के मद्देनज़र अंग्रेजों ने अतिरिक्त रेल सुविधाएं बढ़ाने और नई लाइनें बिछाने का फैसला किया. सरकार ने इसके लिए दिल्ली दरबार रेलवे नामक विशेष संगठन का गठन किया. मार्च से अप्रैल, 1911 के बीच यातायात समस्याओं के निदान के लिए छह बैठकें हुईं, जिनमें दिल्ली में विभिन्न दिशाओं से आने वाली रेलगाड़ियों के लिए 11 प्लेटफार्मों वाला एक मुख्य रेलवे स्टेशन, आज़ादपुर जंक्शन तक दिल्ली दरबार क्षेत्र में दो अतिरिक्त डबल रेल लाइनों, बंबई से दिल्ली बारास्ता आगरा एक नई लाइन बिछाने जैसे महत्वपूर्ण फैसले किए गए. सैनिक और नागरिक रसद पहुंचाने के लिए कलकत्ता से दिल्ली तक प्रतिदिन एक मालगाड़ी चलाई गई, जो हावड़ा से चलकर दिल्ली के किंग्सवे स्टेशन पहुंचती थी. इस तरह मालगाड़ी क़रीब 42 घंटे में 900 मील की दूरी तय करती थी. नवंबर, 1911 में मोटर स्पेशल नामक पांच विशेष रेलगाड़ियां हावड़ा और दिल्ली के बीच चलाई गईं. देश भर से 80,000 सैनिकों को दिल्ली लाने के लिए विशेष रेलगाड़ियां चलाई गईं.
इतिहास और अगर-मगर
अगर प्रथम विश्व युद्ध न छिड़ा होता तो नई दिल्ली के निर्माण में अधिक धन ख़र्च किया जाता और यह शहर अधिक भव्य बनता. यमुना नदी पुराने किले के साथ बहतीं और राजपथ से गुजरने वाले इसके गवाह बनते. अगर लॉर्ड कर्जन और उनके मित्रों की चलती तो नई दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला रद्द हो जाता. अगर हरबर्ट बेकर ने प्रिटोरिया का निर्माण न किया होता तो लुटियन को नई दिल्ली परियोजना में अवसर न मिलता और न विजय चौक (इंडिया प्लेस) प्रिटोरिया की तर्ज पर तैयार होता. अगर लुटियन की मर्जी चली होती तो राष्ट्रपति भवन (गर्वमेंट हॉउस) सरदार पटेल मार्ग पर मालचा पैलेस के नज़दीक रिज में बना होता. लॉर्ड हार्डिंग के इस प्रस्ताव को ख़ारिज करने के बाद ही रायसीना पहाड़ी पर वायसराय हाउस बना.
 ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
साभार 
अयोध्या में है विश्व क़ी सबसे लम्बी कब्र
आप ने भगवान श्री राम क़ी जन्म भूमि अयोध्या के बारे में काफी कुछ सुना होगा,वहाँ गए भी होंगे ,मंदिर एवम घाटों के दर्शन भी किये होंगे |लेकिन आप को क्या मालूम है कि उसी अयोध्या में विश्व क़ी अनोखी कब्र भी है जिसकी लम्बाई लगभग नौ गज है | चौंक पड़े न ,लेकिन सही है | वैसे तो कब्रे व मजारें तो दुनिया भर में हैं,लेकिन यह कब्र उच्च अनोखी है | जिसे हजरत - नुह - अल - ए- इस्लाम क़ी बताई जाती है | लेकिन इतिहासकरों में भी इस बात को लेकर मतभेद हे | कुछ इतिहासकरों ने नुह - अल - ए- इस्लाम साहब को गंजे शहीद  मना है |कहते हैं कि मोहम्मद साहब के 19 वीं पीढ़ी के नुह - अल - ए- इस्लाम साहब एक बार अपनी किश्ती से कहीं जा रहे थे .जब वे अयोध्या के पास पहुंचे ही थे कि अचानक भिसन तूफान आ गया |जिसकी चपेट में आ कर उनकी किश्ती (नव )के आठ तुकडे हो गए |जिसे वही जमीन में गाड दिया गया | जिसे आज नुह - अल - ए- इस्लाम क़ी कब्र के रूप में बताया जाता है | वहीँ कुछ अन्य इतिहासकरों कि धरना यह है कि आज से लगभग छह हजार साल पहले क़ी यह कब्र काफी पुरानी है जो उन्ही की है |उन्हें मानने वालों का कहना है की यह कबर उन्ही क़ी है,जो उस समय औसत आकार क़ी रही होगी |लेकिन छह हजार वर्ष का समय काम नहीं होता है,इस लिये कब्र क़ी मिटटी फैलाते -फैलाते फैल गई होगी |जो आज नौ गज क़ी हो गई है | इस नौ गज क़ी कब्र का इतिहास कुछ भी हो ,लेकिन आज भी इसे दुनिया क़ी सबसे लम्बी  कब्र का दर्जा हासिल हे |लेकिन जिला प्रशासन एवम पर्यटन विभाग की लापरवाही के चलते आज इसका कोई पुरसा हाल नही है |कब्र के आस-पास गन्दगी का ढेर पड़ा रहता है | नुह - अल - ए- इस्लाम साहब क़ी यह कब्र जब आप अयोध्या के मुख्य मार्ग पर हनुमानगढ़ी से थोडा आगे तुलसी पार्क क़ी ओर चलेंगे तो आप को दायें तरफ एक महल दिखाई देगा, जो राजा साहेब अयोध्या का है | इससे और आगे चलाने पर इसी हाथ आप को अयोध्या कोतवाली  दिखाई देगा | अयोध्या कोतवाली से ही बाएं तरफ कुछ दुकाने हैं,कोतवाली एवम दुकानों के बीच एक संकरा सा रास्ता है,जो अमूमन दिखाई नहीं देता | क्यों की वहाँ पर अतिक्रमण जो होगया है |उस संकरे रास्ते में आप पच्चीस कदम चलेंगे कि आप को या बड़ा सा हाता (मैदान ) दिखाई देगा,जो जिसमे दस फीट चौड़ी  एवम पच्चीस फीट लम्बी एक कब्र दिखाई देगी| इसे ही नुह - अल - ए- इस्लाम साहब क़ी कब्र के रूप में जाना जाता है |आप जब भी अयोध्या जाएँ तो विश्व की इस लम्बी व अनोखी कब्र को देखना मत भूलिएगा |
प्रदीप श्रीवास्तव

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011






7000
 फुट की ऊंचाई पर बसा है हिमाचल का शहर शिमला। दिल्ली व चंडीगढ़ से शिमला के लिये सीधी बस सेवा है। कालका से आप
टवाये ट्रेन द्वारा भी सफर कर सकते हैं। रास्ते में धर्मपुर, सोलन व कंडाघाट तथा तारा देवी मुख्य बस ठहराव हैं। कुम्हार हट्टी से एक सड़क नाहन की ओर जाती है। कालका-शिमला के बीच (सड़क से 1 कि.मी. ऊपर) होटल बडोग हाइट है। सोलन में भी स्तरीय होटल है।
शिमला आने के लिये अच्छा समय है। शिमला में लगभग 400 बजट होटल हैं। माल रोड शिमला का दिल है। यहां वालजी जैसे अच्छे रेस्तरां हैं। यहां कॉफी हाउस में आप दक्षिणी भारत के व्यंजन चख सकते हैं। रिज पर बच्चों के लिये घुड़सवारी आकर्षण है। मई अंतिम सप्ताह में समर फेस्टीवल तथा फिल्म फेस्टीवल का आनंद ले सकते हैं। आजकल यहां बहुत रौनक है।
जेठ महीने की ‘लू’ से बचने के लिये उत्तरी भारत से लाखों सैलानी शिमला सप्ताह भर के लिये आते हैं। अधिकतर मध्य वर्ग के सैलानी यहां आते हैं। विदेशी लोग भी आपको यहां मिल जाएंगे।
शिमला पहाड़ी पर बसा है। रात के समय यह शहर कल्पना लोक-सा बन जाता है। बस अड्डे के पास गुरुद्वारा है तथा पास ही लिफ्ट है। लिफ्ट द्वारा आप सीधे माल रोड जा सकते हैं। आपको चढाई चढऩे की जरूरत नहीं। आजकल यहां मौसम सुहावना है।
शिमला के आसपास अनेक दर्शनीय स्थल हैं।
राज्य संग्रहालय : स्कैंडल प्वायंट से चौड़ा मैदान की ओर लगभग तीन किलोमीटर पैदल आपको चलना होगा। यहां पर प्राचीन सिक्के, मूतयां, तथा कांगड़ा शैली के लघुचित्र संगृहीत हैं।
वाइस   रीगल लाज : 1888 में बनी यह इमारत देखने योग्य है। इसमें भारत के वाइसराय रहते थे। अब इसे एडवांस्ड स्टडीज संस्थान के नाम से जाना जाता है। चौड़ा मैदान से 2 कि.मी. पैदल  यात्रा आपको करनी होगी। यहां नाममात्र का 20 रु. प्रवेश शुल्क लिया जाता है।
क्राइस्ट चर्च : रिज के साथ खड़ी है यह भव्य इमारत जिसे शिमला की शान कहा जा सकता है। 1846-57 के बीच इस गिरिजाघर का निर्माण हुआ।
जाखू मंदिर : हनुमान जी को समर्पित यह मंदिर शिमला की चोटी पर स्थित है। पैदल   आप रिज से जा सकते हैं। अब वाहन द्वारा  भी यहां जाया जा सकता है।
संकट मोचन मंदिर : शिमला-कालका मार्ग पर लगभग 10 कि.मी. दूर बाईं ओर दर्शनीय स्थल है। यहां रेस्तरां  आदि भी हैं।
मशोवरा : शिमला से मात्र 12 कि.मी दूर छोटा-सा मनोहर गांव    है। यहां याक सवारी का मजा लें।
नालदेहरा : मशोवरा से 15 कि.मी. दूर यह रमणीक स्थल है। यहां होटल व रेस्तरां  आदि की भी सुविधा है।
तत्तापानी : नालदेहरा से 30 कि.मी. आगे है तत्तापानी कस्बा। यहां आप गर्म चश्मों का आनंद लें। स्प्रिंगव्यू त्रिमूर्ति    होटल में आप रात बिता सकते हैं।
कसौली :  शिमला से धर्मपुर होते हुए 75कि.मी. की यात्रा है कसौली  सुंदर गांव की। धर्मपुर से 12 कि.मी. चढ़ाई का मार्ग है।  धर्मपुर सोलन के निकट  एक कस्बा है। कसौली की ऊंचाई 1850 मीटर है।
चायल : 2150 मीटर की ऊंचाई पर शिमला दक्षिण की ओर 65 कि.मी. दूर है। यह  ऊंघता हुआ  लघु शहर है।

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

कार्ड एक ,घूमिये कहीं भी - कभी भी

नई दिल्ली। ट्रेन से निकलते ही बस पकड़िए और बस छोड़ते ही मेट्रो। न टिकट लेने की किचकिच और न कोई फिक्र करने की जरूरत। सिर्फ एक कार्ड लें और पूरे देश में कहीं भी बिना रोकटोक यात्रा का लुत्फ उठाएं। ये सब कुछ बहुत जल्द होता दिखेगा।सार्वजनिक परिवहन को इस्तेमाल करने वालों की यात्रा को सुगम बनाने के इरादे से सरकार ने एक बहुउद्देश्यीय यात्रा कार्ड पेश किया है। इसका इस्तेमाल किराए के भुगतान के अलावा पार्किंग शुल्क और टोल टैक्स अदा करने में भी किया जा सकेगा।शहरी विकास मंत्रालय ने मंगलवार को 'राष्ट्रीय साझा गतिशीलता कार्ड [नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड यानी एनसीएमसी] पेश किया है। इसका नाम राष्ट्रीय पक्षी के नाम पर 'मोर' रखा गया है।शहरी विकास मंत्री कमलनाथ ने एनसीएमसी को पेश करते हुए कहा कि इससे बेहतर परिवहन सेवा प्रदान करने में मदद मिलेगी। देश में परिवहन सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए निजी सार्वजनिक भागीदारी [पीपीपी] पर जोर दिया जाएगा, ताकि व्यवस्थित ढंग से अतिरिक्त वित्तीय संसाधन जुटाए जा सकें। एनसीएमसी के लिए देश भर में किराया वसूलने संबंधी प्रणाली विकसित करनी होगी। इसके लिए शहरी विकास सचिव की अध्यक्षता में एक टास्क फोर्स का गठन किया गया है। शहरी विकास मंत्रालय की यूटीआइ इंफ्रास्ट्रक्चर टेक्नोलॉजी एंड सर्विसेज लिमिटेड [आईटीएसएल] ने इस कार्ड से जुड़ी सेवा को विकसित किया है।मंत्रालय से जुड़े एक अधिकारी ने कहा कि एनसीएमसी को पूरी तरह से अमल में आने में अभी पांच साल का वक्त लगेगा। इसे लाने का उद्देश्य देश में एकल परिवहन प्रणाली स्थापित करने के साथ ही यात्रियों को निर्बाध यात्रा की सुविधा प्रदान करना है। इस यात्रा कार्ड का नाम हिंदी में 'मोर' तो रखा गया है, लेकिन अंग्रेजी में इसका मतलब 'अधिक' से है। अंग्रेजी में यह नाम इस संदेश को पहुंचाएगा कि यात्री जितना अधिक इस कार्ड का उपयोग करेंगे, उतना ज्यादा फायदे में रहेंगे।
इस योजना में रेल मंत्रालय से भी मदद ली जाएगी। इसके जरिए राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की स्वीकार्यता बढ़ाने में मदद मिलेगी। कार्ड का वित्तपोषण आंशिक तौर पर सरकार जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीकरण योजना [जेएनएनयूआरएम] के तहत करेगी।
कैसे करेगा काम
-यह कार्ड बस में कंडक्टर द्वारा रीचार्ज किया जा सकेगा। बस के प्रवेश व निकास द्वार पर कार्ड पंचिंग मशीन लगी होगी। उतरते समय कार्ड पंच करने पर किराए की राशि इससे काट ली जाएगी। इसकी व्यवस्था और मॉनीटरिंग एकल खिड़की प्रणाली के जरिए की जाएगी।
कब होगा लागू
-अगले साल मार्च से यह सेवा जयपुर में शुरू कर दी जाएगी। इसके बाद राष्ट्रीय राजधानी के लोग भी इसका फायदा उठा सकेंगे। बेंगलूर और भोपाल के नगर निगमों ने भी इसको लेकर तैयारी कर ली है। देश के प्रमुख शहरों में इसे पांच साल में लागू कर दिया जाएगा।
                                                                                                                                        साभार

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

My Visit to Kataraniya Ghat (U.P.) Slideshow Slideshow

My Visit to Kataraniya Ghat (U.P.) Slideshow Slideshow: TripAdvisor™ TripWow ★ My Visit to Kataraniya Ghat (U.P.) Slideshow Slideshow ★ to BAHRAICH (near Warangal). Stunning free travel slideshows on TripAdvisor
आलमगीर मस्जिद :जहाँ एक शाम 
औरंगजेब ने की थी नमाज अदा
हैदराबाद - नागपुर राष्ट्रिय राजमार्ग नंबर सात पर निज़ामाबाद जिले के कमारेड्डी तहसील का एक गाँव पड़ता है ,जिसे बिस्वापुर के नाम से जाना जाता है |
जब आप निज़ामाबाद से हैदराबाद की ऑर चलेंगे तो रास्ते में बाएं ऑर एक मस्जिद दिखाई देगी,जिसकी एक मीनार जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है | यदपि हाल ही में वक्फबोर्ड ने इस मस्जिद की मरम्मत का काम करवाया भी  है , जिसकी दीवारों पर रंगरोगन तक कर दिए गए है ,लेकिन एक मीनार को पुरातत्व के निर्देश पर वैसा ही छोड़ दिया गया है |जिससे इसके पुराने होने का अहसास लोगों को हो सके | इस मस्जिद को "आलमगीर मस्जिद" के नाम से जाना जाता है |इसके बारे में बताते हैं की जब बादशाह औरंगजेब दक्षिण पर अपनी पताका फहराने के लिए दक्खिन की ऑर जा रहे थे तो एक शाम उनकी यहीं पर पड़ने वाली थी| इतिहास में इस बात का उल्लेख है कि वह  कट्टर ,धर्मांध प्रवृति वाला शासक था,इस लिए उसके निर्देश पर इस मस्जिद का आनन-फानन में निर्माण करवाया गया, जिसके बगल में वजू करने के लिए कुआँ भी खुदवाया गया  | कहते हैं कि जब औरंगजेब यहाँ पहुंचा तब तक सूर्य पश्चिम की ऑर अस्त होने चल पड़े थे,शाम हो चली थी ,औरंगजेब अपने लाव-लश्कर के साथ मस्जिद में रुका ओर शाम की नमाज अदा की | इतिहासकरों के अनुसार औरंगजेब में एक विशेषता थी कि वह किसी भी मस्जिद में  नमाज अदा करने के बाद "सलाम -वाल -ऐ -कुम "बोलता था,अगर इसकी प्रतिधव्नि उसे नहीं सुनी देती तो वह उस मस्जिद को तुरंत गिरव देता |शायद उसे इस मस्जिद में वह ध्वनी सुनी दे गई थी ,जिसके कारण उसने इस मस्जिद को वैसा ही छोड़ कर आगे निकल गया | विगत  कई शताब्दियों से यह मस्जिद उपेक्षित पड़ा हुआ था |जिसकी सुध वक्फ बोर्ड कमारेड्डी के अध्यक्ष एम्.ऐ.माजिद ने लेते हुए  लोगों से मिलकर जीर्णोधार का काम शुरू  करवाया | यदपि अभी भी वहां पर नमाज नहीं पड़ी जारही है |उधर से आने जाने लोग देखते हैं और चले जाते हैं |जब आप इधर से गुजरें तो इसे जरुर देखने,इसके मीनारों पर की गई नक्काशी देखने योग्य है |
चलते -चलते यह भी बताना उचित समझता हूँ कि जब औरंगजेब के हैदराबाद आने की खबर रियासत के निजाम "कुली क़ुतुब शाह " को लगी तो वह व्याकुल हो उठे कि अहिं औरंगजेब की बुरी निगाह "चारमीनार"पर न पड़ जाये,और वह उसे गिरवा दे | उनहोने तुरंत चारमीनार की उपरी मंजिल पर एक छोटी मस्जिद का निर्माण करावा दिया |बताते हैं कि औरंगजेब हैदराबाद पहुँचाने के बाद चारमीनार के बगल स्थित बड़ीमस्जिद  (मक्का मस्जिद ) में नमाज अदा की और चार मीनार का अवलोकन किया | बताते हैं कि उस समय उसे चारमीनार के वहां होने पर कुछ अजीब लगा था,लेकिन जब वह उसके उपरी हिस्से में पहुँच और वहां पर मस्जिद देखी, और उसका मन बदल गया |



                                                                                                          प्रदीप श्रीवास्तव