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गुरुवार, 29 दिसंबर 2011


  प्रकृति क़ी गोद में बसा है  
 " कतरनिया घाट वन जीव अभ्यारण  "

प्रदीप श्रीवास्तव  
 जंगलों के बीच किसे घूमना पसंद नहीं होगा,फिर प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेते हुए उसमे विचरण करना तो सोने पर सुहागा वाली बात होती है | लेकिन वहीँ वन्य प्राणियों के बीच घूमने का साहस काम ही लोगों में होता है |जबकि हर व्यक्ति क़ी इतनी चाह तो जरुर ही होती है कि वह वन्य प्राणियों को उनकी स्वाभाविक आचरण में जरुर देखे |जहाँ पर वह शेर-चीते को शिकार करते हुए, हिरण-सांभर को घने हरे जंगलों के बीच कुलांचे मारते हुए देख सके |हर वन प्रेमी पर्यटकों में  यह आस होती है कि वह जंगल के बीच से बहती नदियों में मछलियों को तैरते हुए,घड़ियाल एवम मगर को रेतीले नदी के तट पर विश्राम करते हुए देख सके | इन्हीं सपनों को सजों कर मै ने हाल में ही उत्तर प्रदेश के बहराइच एवम पीलीभीत तथा नेपाल क़ी सीमा से लगे "कतरनिया घाट वन्य जीव अभ्यारण्य " क्षेत्र के भ्रमण करने  का मन बनाया |बचपन से ही कतरनिया घाट के बारे में सुनते आया था,लेकिन पास में होने के बावजूद अभी  तक वहाँ नहीं जा सका  | नवम्बर माह के तीसरे सपताह में में अपने रिश्तेदार आशीष एवम उनके दो मित्रों के साथ बहराइच से कतरनिया के लिये  निकले |रास्ते में बहराइच जिले क़ी नानपारा तहसील पड़ती है ,तहसील क़ी सीमा ख़त्म होते ही कतरनिया घाट वन अभ्यारण्य क्षेत्र शुरु हो जाता है, लगभग पॉँच सौ किलोमीटर वर्ग क्षेत्र में फैले इस जंगल के बीच से  आज भी छोटी लाइन क़ी रेल दौड़ती है  |यह रेल मार्ग गोंडा को पीलीभीत से वाया बहराइच जोड़ती है | घने जंगलों के बीच इस रेल खंड पर लगभग अस्सी किलोमीटर क़ी यह  रेल यात्रा अपने आप में रोमांचित पैदा करने वाली होती है | कतरनिया घाट वन जीव अभ्यारण नेपाल से निकलने वाली कौडियाल एवम गेरुआ नदी के संगम पर स्थित है | ये दोनों नदियाँ थोडा आगे जा कर शारदा नदी में जा कर मिल जाती हैं ,जो वहाँ से थोडा आगे जा कर घाघरा एवम सरयू के नाम से जानी जाती है |इसी सरयू नदी पर भगवान राम क़ी नगरी अयोध्या बसी है |कौडियाल एवम गेरुआ नदी के उस पर लगभग बारह किलोमीटर के बाद नेपाल देश क़ी सीमा शुरू हो जाती है |हल्की धुप,घने हरे जंगलों के बीच ऊँचे -ऊँचे पेड़ों के बीच से जब हमारी कार गुजर रही थी तो हमने रास्ते में देखा क़ी हर दस मीटर के बाद दोनों ओर दीमक के बिम्ब (घर)बने हुए है , जिनकी ऊँचाई दो मीटर से लेकर आठ मीटर रक् रही होगी |जिसके बारे में अशिस बताते हैं कि पेड़ों के काटने के बाद उनके जड़ों में दीमक इसी तरह अपना बसेरा बना लेते है,कहते हैं क़ी जहाँ पर दीमकों के बिम्ब होते हैं वहाँ पर सांप भी पाए जाते हैं ,लेकिन हम लोगों को रास्ते भर में एक सांप नहीं दिखाई दिया | हाँ घने जंगलों के बीच ऐसा लग रहा था कि मानों शाम हो गई हो,जबकि उस समय दोपहर के बारह ही बज रहे होंगे | उस पर जंगली जानवरों व पक्षियों क़ी अजीबो-गरीब आवाजे सन्नाटे को चीरती हैं तो एक अलग तरह का रोमांच पैदा होता है | अगर कहा जाय कि कतरनिया घाट वन जीव अभ्यारण क्षेत्र लुप्तप्राय वनस्पतियों एवम जीवों का सबसे शांत निवास है ,जो उन्हें आश्रय भी देता है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा | इस वन क्षेत्र में बाघ,तेंदुए ,घड़ियाल, मगरमच्छ ,गैंडा,हाथी जंगली सूअर ,चीतल,हिरण के अलावा बड़ी डालफिन मछली ,,कई प्रजातियों के बन्दर,अजगरों के अलावा यहाँ पर एक-से-एक सुनदर व विभिन्न तरह के पक्षियों को कभी देखा जा सकता है |आज दुनिया में गिद्धों क़ी संख्या में निरंतर गिरावट देखी जा रही है,लेकिन यहाँ पर जंगलों के बीच विभिन्न प्रजातियों के गिद्धों को देखा जा सकता है |जिनमे खाकी रंग वाला ,लाल सिर वाला एवम मिस्र में पाए जाने वाले गिद्ध प्रमुख हैं |
दिन भर क़ी यात्रा के दौरान मुझे कतरनिया के जंगलों में बाघ ,चिट्टा व शेरों के दर्शन तो नहीं हुए ,परन्तु एक जगह बाघ के पैरों के चिन्ह जरुर दिखाई दिया,जो एक नाले के किनारे था| जिसके बारे में हमारे साथ चल रहे विनोद बताते हैं कि शायद कुछ देर पहले ही कोई बाघ यहाँ पानी पीने आया था |यह सुन कर एक बार मेरे शरीर में सिहरन सी दौड़ पड़ी |सोच कहीं आस-पास तो नहीं है ? ख़ैर वहाँ से आगे बड़े तो थोड़ी दूर जाने पर देखा कि नदी क़ी ओर जाने वाला मार्ग लकड़ी क़ी बल्ली से बंद है,अभी हम लोग सोच ही रहे थे कि उधर से गुजर रही दो नेपाली महिलाओं ने बताया कि उस लकड़ी के बल्ली को हटा कर जा सकते हैं |हम लोगों ने वैसा ही किया,और गेरुवा नदी के किनारे पहुँच गए | सामने कौडियाल एवम गेरुआ नदी का  संगम, पास में ही मिनी पुरवा गावं ,नदी के संगम पर बने तट पर दर्जनों घडियाल सुनहरी रेत पर पावं पसारे आराम फरमा रहे हैं,जिनमे तो कुछ नवजात भी थे| जिन्हें देख कर लगा कि चलो यहाँ तक आना  सफल रहा |  अ़ब इच्छा हुई क़ी उन्हें पास से देखा जाये ,लेकिन उनतक पहुँचाना कठिन था,तभी मिनी पुरवा गावं के किसान बशीरुद्दीन मिल जाते हैं ,पहले वे हम लोगों को देख कर चोंक जाते हैं ,उन्हें लगता है कि जंगल विभाग का कोई अधिकारी है,लेकिन उनकी परेशानी हम लोग भांप जाते है और उन्हें आश्वस्त करते है कि जो वह समझ रहे हैं, हम लोग वह नहीं हैं | तब बशीरुद्दीन बताते हैं कि आप को घड़ियाल को निकट से देखना है तो कतरनिया घाट पर ही जाये,वहाँ से मोटर बोट मिल जायेगी ,जिससे आप लोग वहाँ तक जा सकेंगे| हम लोग वहाँ से कतरनिया घाट के चल देते हैं ,ठीक जंगल के बीच टेड़े- मेडे रास्तों पर,जिसके दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड ,उनके बीच लम्बे-लम्बे जंगली घास|
इसी दौरान जंगल के बीच सुनसान ईलाके में तीन युवतियां अपने-अपने सर पर लकड़ियों क़ी गाठें लड़े आती हुई दिखाई देती है,तभी उनमे से एक काम उम्र क़ी लड़की हम लोगों को देख कर लकड़ी क़ी गांठ वहीँ छोड़ कर भाग जाती है,जब कि उसके साथ वाली दोनों लड़कियां डरी-सहमी सी एकटक हमलोगों को देखती रहती हैं ,जिन्हें हम लोग बताते हैं कि हम सरकारी आदमी नहीं है,इस पर वे निश्चिन्त होती हैं|तभी वह युवती भी वापस आ जाती है,जिसके चहरे पर से डर का भाव गायब दिखाई देता है | वे हमें आगे का रास्ता बतातीं है,जिस पर हम चल देते हैं | थोड़ी दूर आगे जाने पर जैसे ही हमारी कार दाहिने ओर मुड़ती है तो सामने एक बारहसिंगा बीच रास्ते में दिखाई देता है | जिसे देख कर हम अपनी गाड़ी वहीँ रोक देते है,इसी बीच मैं अपना कैमरा आन करना चाहता हूँ कि उसे अपने कैमरे में कैद कर  सकूँ,तभी वह कुलांचे मारता हुआ हमें ठेंगा दिखा कर गायब हो गया| | यहाँ यह बता दूँ कि कतरनिया के इस घने जंगल में सेल फ़ोन काम नहीं करता है,क्यों कि किसी भी कम्पनी के टावर नहीं लगे हैं |सरकारी महकमा वायरलेस पर या फिर बी एस. एन.एल पर ही निर्भर रहता है | अब हम लोग उस जगह पर पहुंचाते हैं जहाँ से वन विभाग द्वारा मोटर बोट से नदी के बीच बने रेतीले टापू  पर आराम कर रहे घड़ियालों  को दिखाया जाता है| लेकिन दोपहर होने क़ी वजह से वहाँ पर कोई भी कर्मचारी नहीं मिल सका जो हमें वहाँ तक ले जाता | पास में ही काफी ऊँचा मचान बना है जहाँ से चढ़ कर लोग रेतीले टापू पर बैठे घडियालों को देख सकते हैं |
इसी कौडियाल एवम गेरुआ नदी में डालफिन मछली भी बहुतायत मात्रा में पाई जाती है | कहते हैं कि डालफिन मछली अमेरिका के बाद भारत में यहीं पर अधिकाधिक संख्या में मिलाती है| वैसे गंगा नदी के दोआबा में (बिहार )में भी मिलाती हैं| इस संदर्भ में क्षेत्रीय वन अधिकारी एन.के शुक्ला  बताते हैं कि यहाँ पर वही पर्यटक अधिक आते हैं जिन्हें प्रकृति से प्रेम होता है |उनमे भी अधिक संख्या विदेशियों की अधिक होती है |जो यहाँ पर आ कर हफ्तों नहीं महीनों रुकते हैं और  शोध कार्य भी करते हैं | श्री शुक्ला  जी बताते हैं कि  कौडियाल एवम गेरुआ नदी के साफ और नीले पानी में घडियालों के अलावा वहाँ पर आप को प्रवासी पक्षियों का भी सुन्दर  नजारा देखने को भी मिलेगा |पानी की सतह पर रंग-बिरंगी विदेशी पक्षियों को देख कर आम आदमी भी मंत्रमुग्ध हो जाता है |वे बताते हैं कि सूर्यास्त के साथ ही कौडियाल एवम गेरुआ नदी के सतह पर डालफिन मच्चालियों की हठखेलियाँ शुरु हो जाती हैं | पहले इस पार से उस पार जाने के लिये पीपे का पुल हुआ करता था,जिस पर से शाम को लोग डालफिन मछलियों के नृत्य का आनंद उठाते थे ,लेकिन कुछ साल पहले उसके टूट जाने से लोगों को वह आनंद नहीं मिल पा रहा है | यहाँ पर डब्ल्यू .डब्ल्यू.एफ. के सौजन्य से खास पर्यटकों के लिये कुछ विशेष सुविधाएँ भी मुहैया कराई जाती हैं ,जिनमे मोटर बोट भी शामिल हैं |जिस पर आप सवार होकर घडियालों व मगरमच्छ के टापुओं तक पहुंचाते हैं ,साथ ही वहाँ पर सुरखाब के दर्शन भी कर सकते हैं |मोटर बोट से आप जंगल के भीतर गेरुआ के बैक वाटर के काफी अन्दर तक भी जा सकते हैं | जब आप बेतों के जंगलों के बीच पानी से गुजरें गे तो आप अंदमान निकोबार क़ी याद अवश्य आएगी| पानी के दोनों किनारे बेतों क़ी घनी झाड़ियाँ ,जिनके स्पर्श होने पर काँटों का चुभना आप को और रोमांचित कर देता है |इन्हीं झाड़ियों के बीच अक्सर शाम को जंगल के राजा बाघ पानी पीते  दिखाई देते हैं , वहीँ हाथियों के जुंड को भी देखा जा सकता है यहाँ पर | सही मायने में कहा जाये तो यह जगह अजगरों के लिये उनका बसेरा ही है | कतरनिया घाट के जंगलों में हजारों प्रजातियों के पक्षियों को पाकड़ , पीपल,बड़,गुलर शीशम ,साल व सागवान के  पेड़ों पर फुदुकते देखा जा सकता है| जिनमें नीलकंठ,बुलबुल,पत्थरचिट्टा ,टनटूर,कोकिल ,हुदहुद,चील, मोर, तीतर,कठफोड़वा,बटेर ,टिटहरी ,बाज,तोता,गिद्ध,कबूतर बयान ,श्यामा के साथ-साथ जंगली मुर्गे शामिल हैं| जंगली मुर्गे रंगबिरंगे होते हैं जिन्हें देखते ही बनता है |
कतरनिया घाट वाइल्ड लाईफ सेंचुरी (कतरनिया वन्य जीव अभ्यारण्य )सन 1997 में अस्तित्व में आया जब सरकार ने इसकी विधिवत घोषणा की |इसके पहले तक इसे सामान्य जंगलों क़ी श्रेणी में ही रखा जाता था | बताते हैं क़ी 1980 के पहले यहाँ पर अंग्रेजों के निर्देशानुसार पेड काटो जीवन चलाओ का फार्मूला लागू था | लेकिन 1980 में जब तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी स्वीडेन गईं तो उन्हों ने वहाँ पर देखा क़ी वहाँ के लोग जंगल बचाने में लगे हैं | इससे वे बहुत प्रभावित हुईं | स्वदेश लौटने के बड़ उनहोने देश के जंगलों को बचाने के लिये 1980 कन्जर्वेसन एक्ट बनाया, जिसे तुरन्त  लागू किया गया,तभी से "पेड काटो -बेचो " क़ी जगह "जंगलों को बचाओ "लागू हो गया | इस एक्ट के लागू होने से पेड़ों के काटने पर रोक लग गई |
यहाँ यह बताना समायोचित होगा कि पहले एवम दूसरे विश्व युद्ध में प्रयोग किये गए पानी के जहाजों में जिन लकड़ियों का प्रयोग किया गया था ,वे सभी कतरनिया के जंगलों के ही थे | वन विभाग के एक सरकारी अधिकारी ने नाम न बताने क़ी शर्त पर बताया कि रेलवे में सीमेंट के स्लीपरों के पहले पूरे भारत में लकड़ी के जो स्लीपर प्रयोग में लाये जाते थे वे सभी कतरनिया के जंगलों के ही होते थे |
प्राकृतिक सम्पदा से भर पूर कतरनिया वां जीव अभ्यारण्य क्षेत्र में पर्यटकों के लिये रुकने क़ी कोई समुचित व्यवस्था नहीं है ,जिसके कारण पर्यटक यहाँ आना पसंद नहीं करते है |कुल मिलाकरइस अभ्यारण्य क्षेत्र में वन विभाग के दो गेस्ट हाउस हैं जिनकी बुकिंग वन विभाग के बहराइच के कार्यालय से नहीं तो राजधानी लखनऊ के मुख्यालय से करानी होती है | घने जंगलों के बीच होने क़ी वजह से भी पर्यटक रात में रुकना नहीं चाहते हैं |
जबकि कतरनिया घाट क़ी दूरी लखनऊ से लगभग दो सौ पचास किलोमीटर एवम बहराइच से सत्तर एवम पीलीभीत से साठ किलोमीटर है|



        

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